भारत में बढ़ते हृदय रोग और अचानक होने वाले हार्ट अटैक ने चिकित्सा जगत के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे समय में IIT कानपुर के वैज्ञानिकों और हृदय रोग विशेषज्ञों ने मिलकर एक ऐसा कृत्रिम हृदय तैयार किया है, जो भविष्य में हार्ट ट्रांसप्लांट का महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। यह उपलब्धि न केवल भारतीय चिकित्सा तकनीक को आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि लाखों मरीजों के जीवन की उम्मीद भी बढ़ाएगी।
दो चरणों में होगा परीक्षण, इंसानी प्रत्यारोपण की दिशा में बड़ा कदम
IIT कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर के अनुसार 2023 में प्रारंभिक ट्रायल के बाद अब इस कृत्रिम हृदय का पशुओं पर परीक्षण शुरू होने जा रहा है। इसी महीने से प्रथम चरण के परीक्षण शुरू होंगे और सफलता मिलने पर आने वाले दो वर्षों में इसे मनुष्यों में प्रत्यारोपित किए जाने की संभावना है। यह परीक्षण चिकित्सीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कृत्रिम हृदय का मुख्य उद्देश्य शरीर के सभी अंगों तक पर्याप्त और सही रक्त प्रवाह सुनिश्चित करना है।
वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की संयुक्त विशेषज्ञता का परिणाम
कृत्रिम हृदय विकसित करने वाली टीम में IIT कानपुर के करीब 10 वैज्ञानिक और अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञ शामिल हैं। टीम का लक्ष्य एक ऐसा उपकरण बनाना है जो वास्तविक हृदय की तरह लगातार और सहज रूप से रक्त पंप कर सके। यदि इस तकनीक को सफलता मिलती है तो यह हृदय प्रत्यारोपण के लिए एक बड़ी राहत साबित होगी, क्योंकि विश्वभर में हार्ट डोनर की कमी से लाखों मरीज हर साल इलाज से वंचित रह जाते हैं।
स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों की दिशा में नई ऊर्जा
कोरोना काल ने भारतीय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की क्षमता को नई पहचान दी। मुश्किल हालातों में देश ने कई आधुनिक तकनीकें स्वयं विकसित कीं। प्रो. करंदीकर ने बताया कि जहां विदेशों से आयातित वेंटिलेटर की कीमत 10 से 12 लाख रुपये होती थी, वहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने सिर्फ 90 दिनों में उसे स्वदेशी रूप से विकसित कर मात्र ढाई लाख रुपये में उपलब्ध करा दिया। आज भी भारत में सिर्फ 20% चिकित्सा उपकरण ही बनते हैं, जबकि 80% इंप्लांट विदेशों से आयात किए जाते हैं। इनमें से सबसे बड़ी संख्या हृदय रोगियों के लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की होती है।
दिल के मरीजों के लिए नया युग, स्वदेशी तकनीक से बढ़ेगी उम्मीद
इस कृत्रिम हृदय का सफल विकास और परीक्षण भारत को स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हृदय रोगियों के लिए यह भविष्य में जीवनरक्षक विकल्प बन सकता है, विशेषकर उन मरीजों के लिए जिन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह उपलब्धि न केवल इलाज को किफायती बनाएगी, बल्कि भारत की हेल्थकेयर प्रणाली को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत साबित करेगी।
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