पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और समुद्री मार्गों पर अस्थिरता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट और आत्मनिर्भर रुख सामने रखा है। केंद्र सरकार ने कहा है कि देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर और सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित करना है। इसी कारण भारत अपने कच्चे तेल की खरीद उन देशों से करता है जहां से उसे सबसे बेहतर और किफायती दरें मिलती हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद देश की ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर बनी हुई है।
होर्मुज मार्ग पर तनाव और वैश्विक चिंता
हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य टकराव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। यह मार्ग विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। ऐसे माहौल में कई देशों ने अपने ऊर्जा आयात को लेकर रणनीतियों में बदलाव किया है, वहीं भारत ने भी अपने हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाई है।
रूस से तेल आयात जारी रखने का निर्णय
केंद्र सरकार ने यह भी पुष्टि की कि रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रहेगा। हाल ही में पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति के कारण अमेरिका की ओर से अस्थायी छूट दिए जाने के बाद इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने कहा कि देश की ऊर्जा नीति पूरी तरह स्वतंत्र है और तेल आयात के फैसले राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। सरकार के अनुसार रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है और वर्तमान में भी यह स्थिति कायम है।
आयात स्रोतों का व्यापक विस्तार
सरकार ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों को काफी विविध बनाया है। पहले जहां देश लगभग सत्ताईस देशों से तेल आयात करता था, वहीं अब यह संख्या बढ़कर चालीस तक पहुंच गई है। इस रणनीति के कारण भारत ने अपने लिए कई वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सुनिश्चित कर लिए हैं। ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर भी देश की आपूर्ति प्रणाली प्रभावित नहीं होती।
ऊर्जा भंडार और परिष्करण क्षमता
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारत ने अपने भंडारण और परिष्करण ढांचे को भी मजबूत किया है। सरकार के अनुसार देश के पास वर्तमान में दो सौ पचास मिलियन बैरल से अधिक कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार उपलब्ध है। यह भंडार लगभग सात से आठ सप्ताह की खपत के बराबर सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा देश की कुल परिष्करण क्षमता भी घरेलू मांग से अधिक है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त प्रसंस्करण और निर्यात की संभावनाएं बनी रहती हैं।
वैश्विक बाजार पर युद्ध का प्रभाव
पश्चिम एशिया में अमेरिका और इस्राइल की सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में क्षेत्रीय प्रतिक्रिया ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों में रुकावट और सुरक्षा जोखिमों के कारण तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। ऐसे परिदृश्य में भारत का बहुस्तरीय ऊर्जा स्रोतों पर आधारित दृष्टिकोण उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में बनाए रखने में मदद कर सकता है।
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