देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रहने से मौसम का स्वरूप चिंता पैदा करने लगा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के नवीनतम आकलन के अनुसार शनिवार तक देशभर में सामान्य की तुलना में लगभग 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। यद्यपि मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आगामी दिनों में मानसून धीरे-धीरे पूरे देश में फैल जाएगा, फिर भी पूरे वर्षा ऋतु के दौरान सामान्य से कम बारिश की आशंका बनी हुई है। यदि वर्षा का यह घाटा लंबे समय तक कायम रहता है तो इसका प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि उत्पादन, जलाशयों के जलस्तर, पेयजल उपलब्धता तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून केवल मौसम का विषय नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी आधार है, इसलिए इसकी प्रत्येक गतिविधि पर वैज्ञानिकों की सतत निगाह बनी हुई है।
एल नीनो और भारतीय महासागर डाइपोल का बदलता समीकरण
मौसम विज्ञानियों के अनुसार इस वर्ष मानसून को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में एल नीनो और भारतीय महासागर डाइपोल की तटस्थ स्थिति शामिल है। सामान्य परिस्थितियों में यदि भारतीय महासागर डाइपोल सकारात्मक अवस्था में होता है तो वह एल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर देता है। वर्ष 2023 इसका प्रमुख उदाहरण रहा, जब मजबूत एल नीनो के बावजूद सकारात्मक डाइपोल के कारण देश में लगभग सामान्य वर्षा दर्ज की गई थी। इस वर्ष स्थिति भिन्न है क्योंकि डाइपोल तटस्थ बना हुआ है, जिससे एल नीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी हो सकता है। मौसम मिशन कूपल्ड फोरकास्ट सिस्टम के पूर्वानुमान भी संकेत दे रहे हैं कि मानसून के अधिकांश समय यही स्थिति बनी रह सकती है, जिससे वर्षा वितरण असमान रहने की संभावना बढ़ जाती है।
दिल्ली में उमस ने तोड़े रिकॉर्ड, 'फील्स लाइक' तापमान बना नया खतरा
राष्ट्रीय राजधानी में इस समय केवल अधिकतम तापमान ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि अत्यधिक नमी के कारण महसूस होने वाली गर्मी लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। शनिवार दोपहर राजधानी में 'फील्स लाइक' तापमान 51.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो इस मौसम के सबसे ऊंचे स्तरों में दर्ज किया गया। वास्तविक अधिकतम तापमान 41.3 डिग्री सेल्सियस होने के बावजूद वातावरण में लगभग 45 प्रतिशत नमी के कारण शरीर से पसीने का वाष्पीकरण धीमा हो गया, जिससे लोगों को वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस हुई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में हीट स्ट्रेस, निर्जलीकरण, थकान और हीट स्ट्रोक का जोखिम तेजी से बढ़ जाता है तथा बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
मध्य भारत से दक्षिण तक बारिश की कमी ने बढ़ाई कृषि क्षेत्र की चिंता
मानसून में कमी का सबसे गंभीर असर उन क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है जहां खेती मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती है। मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख कृषि राज्य में सामान्य से लगभग 41 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जबकि पूरे मध्य भारत में यह कमी लगभग 57 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में भी वर्षा का घाटा उल्लेखनीय बना हुआ है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में मानसून समय से पहले पहुंचने के बावजूद अपेक्षित वर्षा नहीं हो सकी, जिसके कारण कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में भी सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। यदि आगामी सप्ताहों में वर्षा की गति नहीं बढ़ती तो खरीफ फसलों की बुआई, सिंचाई व्यवस्था तथा ग्रामीण आय पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
सूखे की आशंका और अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अभी पूरे मानसून सत्र का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, क्योंकि जुलाई और अगस्त के महीने कुल वर्षा में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी यदि सामान्य से अधिक वर्षा घाटा बना रहता है तो सूखे जैसी परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं। इसका प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य मुद्रास्फीति, जलविद्युत उत्पादन, जलाशयों की क्षमता, ग्रामीण मांग और समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार, कृषि वैज्ञानिकों और जल प्रबंधन एजेंसियों को अभी से समन्वित रणनीति अपनानी चाहिए ताकि संभावित जोखिमों को समय रहते कम किया जा सके। साथ ही किसानों को भी स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों के आधार पर फसल चयन और सिंचाई प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है, जिससे बदलते मौसम की चुनौतियों का प्रभाव न्यूनतम रखा जा सके।