ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत ने जिस गति से रक्षा आधुनिकीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, उससे स्पष्ट है कि देश अब अपने सैन्य ढांचे को वैश्विक मानकों तक पहुँचाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इसी दिशा में भारतीय वायु सेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की नई खरीद प्रक्रिया ने तेजी पकड़ ली है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे से पहले यह कदम न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामरिक आवश्यकता को भी मजबूत आधार प्रदान करता है।
DAC की महत्वपूर्ण बैठक और 3.25 लाख करोड़ की मेगा डील की रूपरेखा
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद इस महीने दूसरी बार बैठक करने जा रही है, जिसमें 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के प्रस्ताव को ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ की मंजूरी देने की संभावना है। लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की यह डील भारतीय रक्षा इतिहास की सबसे बड़ी परियोजनाओं में शामिल होगी। प्रस्ताव के अनुसार 18 राफेल विमान सीधे फ्लाई-अवे कंडीशन में मिलेंगे, जबकि शेष विमानों का निर्माण भारत में स्वदेशी सामग्री के साथ किया जाएगा। लगभग 80 प्रतिशत फ्लीट ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार होगा, जिससे न केवल वायु शक्ति बढ़ेगी, बल्कि देश की रक्षा औद्योगिक क्षमता भी मजबूत होगी।
भारतीय निर्माण मॉडल और IAF की भविष्य की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ
इस परियोजना के तहत भारतीय वायु सेना को 88 सिंगल-सीटर और 26 ट्विन-सीटर राफेल विमान मिलने का प्रस्ताव है। डसॉल्ट और भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों के सहयोग से इन विमानों का निर्माण भारत में होगा, जिससे देश रक्षा निर्माण के वैश्विक मानचित्र पर और भी सशक्त रूप से उभरेगा। वर्तमान में IAF के पास लगभग 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि आवश्यकता 42 स्क्वाड्रन की है। इस डील के बाद IAF के पास कुल 150 राफेल का बेड़ा होगा, जो पाकिस्तान-चीन के संयुक्त खतरे के परिप्रेक्ष्य में भारत की सामरिक स्थिति को निर्णायक बढ़त देगा।
रणनीतिक विशेषज्ञों की राय और राफेल की युद्धक क्षमता
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और चीन की बढ़ती सामरिक साझेदारी क्षेत्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रही है, ऐसे में भारत के लिए उन्नत मल्टीरोल फाइटर जेट की जरूरत अत्यंत आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल ने अपनी 4.5-जेन क्षमता का ऐसा प्रदर्शन किया जिसने इसकी प्रामाणिकता को और मजबूत किया। मेटियोर, स्कैल्प, हैमर और लेज़र गाइडेड बम जैसी मिसाइलों से लैस राफेल किसी भी मोर्चे पर निर्णायक बढ़त दिलाने में सक्षम है। विशेषज्ञों के अनुसार यह डील IAF को अगले एक दशक तक मजबूत और तकनीकी रूप से श्रेष्ठ बनाए रखेगी।
AMCA और तेजस कार्यक्रम की धीमी गति के बीच राफेल की अनिवार्यता
भारत वर्तमान में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA कार्यक्रम को गति देने में व्यस्त है, लेकिन उद्योग साझेदारों के चयन की प्रक्रिया अभी चल रही है। तेजस MkIA का उत्पादन भी इंजन आपूर्ति पर निर्भर होने के कारण अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इन दोनों परियोजनाओं की गति को देखते हुए राफेल की खरीद समय की मांग बन चुकी है, जिससे वायु सेना की तत्काल और मध्यम अवधि की जरूरतें पूरी की जा सकें।
भारत की रक्षा शक्ति में बड़ा उछाल और पड़ोसी देशों की बढ़ती चिंता
राफेल की यह मेगा डील भारत के रक्षा ढांचे को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करने जा रही है। इससे वायु सेना की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ बढ़ेगी, तकनीकी श्रेष्ठता हासिल होगी और भारत की सामरिक चुनौती का सामना करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। यह स्पष्ट है कि 114 राफेल जेट का अधिग्रहण पड़ोसी देशों, विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन, के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन जाएगा। भारत का यह निर्णय न सिर्फ उसकी सैन्य क्षमता को नई ऊँचाई देगा बल्कि यह भी सिद्ध करेगा कि देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता पर किसी भी प्रकार का समझौता करने वाला नहीं है।
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