


आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने संगठन या या सरकार में सेवानिवृत्ति की किसी भी अवधारणा से इनकार किया है। अखंड भारत की सोच को अटल सत्य बताते हुए उन्होंने कहा कि जो भारत से अलग हुए वे आज दुखी हैं। सरकार की नयी शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा फॉर्मूले का स्वागत किया, लेकिन कहा कि देश की एक संपर्क भाषा तो होनी ही चाहिए, मगर वह विदेशी न हो। मिशनरी स्कूलों में परोसे जा रहे पश्चिमी रस्म-रिवाज में परिवर्तन जरूरी है। साथ ही आत्मगौरव जगाने वाले इतिहास की पढ़ाई पर उन्होंने जोर दिया।
अवैध घुसपैठ के खिलाफ सरकार की नीति का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा जनसांख्यिकी बदलाव से असंतुलन बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है, परंतु तीन बच्चों की पैदाइश से दंपति के स्वास्थ्य को भी लाभ मिलता है। भागवत ने आरक्षण का भी समर्थन किया और जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोध। डॉ. मोहन भागवत विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान शृंखला के अंतिम दिन सवालों के जवाब दे रहे थे।
भागवत ने कहा, ‘किसी 35 साल के व्यक्ति को कहा जाये कि तुम ऑफिस में बैठो तो वह बैठेगा।’ उन्होंने सेवानिवृत्ति की उम्र से साफ इनकार किया। साथ ही सामने बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘इस हॉल में कम से कम दस लोग बैठे हैं। वे किसी भी समय मेरी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं और काम कर सकते हैं।’ सेवानिवृत्ति को लेकर भागवत की टिप्पणी को प्रधानमंत्री मोदी के लिए संघ की ओर से मिली उम्र संबंधी ‘क्लीन चिट’ से जोड़कर देखा जा रहा है।
भाजपा अध्यक्ष के चयन पर दखलंदाजी नहीं
संघ प्रमुख भागवत ने इस बात से साफ इनकार किया कि उनका संगठन भाजपा के लिए सब कुछ तय करता है। उन्होंने कहा कि सुझाव पार्टी को दिए जाते हैं, लेकिन फैसले पार्टी लेती है। भागवत ने यह भी कहा कि भाजपा के नए प्रमुख के चयन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है। भागवत ने कहा कि आरएसएस और सरकारों के बीच कोई मतभेद नहीं है, चाहे वह केंद्र में हो या राज्य में। भागवत ने कहा, ‘मैं पिछले 50 सालों से शाखाएं संचालित कर रहा हूं। अगर कोई मुझे शाखा संचालित करने की सलाह देता है, तो मैं उसका विशेषज्ञ हूं। भाजपा कई वर्षों से सरकार चला रही है। इसलिए वे सरकार मामलों के विशेषज्ञ हैं।’ आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सुझाव दिए जा सकते हैं लेकिन निर्णय उन्हें ही लेना होगा क्योंकि यह उनका क्षेत्र है।