बसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक पर्व है, जब शीत ऋतु की जड़ता समाप्त होकर प्रकृति नवजीवन से भर उठती है। खेतों में लहलहाती सरसों, वृक्षों पर नए पत्ते और वातावरण में उल्लास इस परिवर्तन को दर्शाते हैं। भारतीय परंपरा में यह दिन नई शुरुआत, रचनात्मकता और सकारात्मक ऊर्जा का सूचक माना गया है।
मां सरस्वती का अवतरण और इस दिन का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी के दिन ही ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसी कारण इस दिन सरस्वती पूजा का विशेष विधान है। विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कलाकार और संगीत साधक इस दिन ज्ञान-वृद्धि और बौद्धिक शुद्धता की कामना करते हैं।
पीला रंग: प्रकृति, ऊर्जा और आशा का प्रतीक
पीला रंग वसंत ऋतु का स्वाभाविक रंग है। यह सूर्य के तेज, उल्लास, आशावाद और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी पीला रंग मन को प्रसन्न करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और नकारात्मकता को दूर करता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी में पीले रंग को विशेष महत्व दिया गया है।
पीले वस्त्र पहनने की परंपरा के पीछे धार्मिक भाव
शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण करने से मां सरस्वती शीघ्र प्रसन्न होती हैं। यह वस्त्र-परंपरा साधक और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करती है। पीले वस्त्र पहनकर पूजा करने से बुद्धि की निर्मलता, विचारों की स्पष्टता और ज्ञान की स्थिरता प्राप्त होती है।
पूजा, प्रसाद और सजावट में पीले रंग की प्रधानता
बसंत पंचमी पर पीले फूलों से पूजा, पीली रंगोली, पीले वस्त्र और पीले व्यंजन जैसे केसरिया खीर, बूंदी या मीठा चावल अर्पित किए जाते हैं। यह सब मां सरस्वती के सात्त्विक स्वरूप और वसंत की सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जिससे घर और मन दोनों पवित्र होते हैं।
छात्रों और कलाकारों के लिए क्यों है यह दिन विशेष
यह दिन विद्या आरंभ, पुस्तक पूजा और रचनात्मक कार्यों की शुरुआत के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। पीले वस्त्र धारण कर मां सरस्वती की आराधना करने से स्मरण शक्ति, एकाग्रता और कलात्मक प्रतिभा में वृद्धि मानी जाती है। इसलिए यह पर्व शिक्षा और साधना से जुड़े लोगों के लिए विशेष फलदायी है।
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