कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा एक बड़ा उत्सव है। इसकी शुरुआत का संकेत देने वाले खास अवसरों में महालया का विशेष स्थान है। इस दिन जहां लोग अपने पूर्वजों को याद कर तर्पण करते हैं, वहीं मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाने की परंपरा यानी ‘चक्षुदान’ भी खास आकर्षण का केंद्र रहती है। इसके अलावा, बंगाली संस्कृति की पहचान मानी जाने वाली लाल-पाड़ वाली सफेद साड़ी भी दुर्गा पूजा के दौरान अलग ही छटा बिखेरती है।
महालया से जुड़ी है दुर्गा पूजा की शुरुआत की भावना
बंगाल में महालया का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद खास है। यह दिन पितृपक्ष के समापन और देवीपक्ष के आगमन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी समय मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियों को एक नई गति मिलती है। महालया की सुबह रेडियो पर प्रसारित होने वाला प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘महिषासुरमर्दिनी’ सुनने की परंपरा भी बंगाली समाज में काफी लोकप्रिय है। इसकी स्तुतियों और मंत्रोच्चार के साथ अनेक परिवार दुर्गा पूजा के आगमन का अनुभव करते हैं।
क्या है मां दुर्गा की प्रतिमा का चक्षुदान?
महालया से जुड़ी सबसे चर्चित परंपराओं में मां दुर्गा की प्रतिमा का ‘चक्षुदान’ शामिल है। बंगाली भाषा में इसे ‘चोख्खुदान’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है आंखें देना। इस रस्म के दौरान मूर्तिकार देवी की प्रतिमा की आंखों को अंतिम रूप देते हैं। यह काम बेहद सावधानी और कलात्मक कुशलता के साथ किया जाता है, क्योंकि आंखों से ही प्रतिमा के चेहरे पर देवी की शक्ति, करुणा और तेज की अभिव्यक्ति उभरती है।
धार्मिक मान्यताओं में चक्षुदान को देवी की प्रतिमा को पूर्णता देने और उसे आराधना के लिए तैयार करने का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इस प्रक्रिया को केवल मूर्तिकला का हिस्सा नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण रस्म के रूप में भी देखा जाता है।
कुम्हारटोली में दिखती है परंपरा और कला की झलक
कोलकाता का कुम्हारटोली इलाका अपनी पारंपरिक मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर पीढ़ियों से मिट्टी की प्रतिमाएं तैयार करते आ रहे हैं। दुर्गा पूजा से पहले इन कार्यशालाओं में प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज हो जाता है। मिट्टी से आकार देने, रंग भरने और बारीक सजावट के बाद आंखें बनाने का चरण विशेष सावधानी से पूरा किया जाता है। चक्षुदान के दौरान कारीगरों की एकाग्रता और हुनर देखने लायक होता है।
हालांकि, चक्षुदान की सटीक प्रक्रिया और उसका समय अलग-अलग मूर्तिकारों, परिवारों और परंपराओं के अनुसार बदल सकता है। फिर भी, महालया के साथ इसका जुड़ाव बंगाल की दुर्गा पूजा को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देता है।
लाल-पाड़ वाली सफेद साड़ी क्यों है इतनी खास?
दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली महिलाओं के पारंपरिक परिधानों में लाल-पाड़ वाली सफेद साड़ी का विशेष स्थान है। इसे बंगाली भाषा में ‘लाल पाड़ सादा साड़ी’ कहा जाता है। सफेद कपड़े पर लाल रंग का किनारा इस साड़ी को अलग पहचान देता है। यह पहनावा पूजा-पाठ, पारंपरिक आयोजनों और विशेष रूप से दुर्गा पूजा के अवसर पर खूब दिखाई देता है।
इस साड़ी की लोकप्रियता केवल इसके पारंपरिक रूप तक सीमित नहीं है। यह बंगाल की सांस्कृतिक विरासत, बुनाई की कला और पीढ़ियों से चली आ रही पहनावे की परंपरा का भी प्रतीक है। तांत जैसी पारंपरिक सूती साड़ियों से लेकर रेशमी कपड़ों तक, लाल किनारे वाली सफेद साड़ी कई रूपों में उपलब्ध होती है।
लाल और सफेद रंगों का क्या है धार्मिक महत्व?
पारंपरिक मान्यताओं में सफेद रंग को पवित्रता, शांति और सादगी से जोड़ा जाता है, जबकि लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, उत्साह और शुभता का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा की आराधना शक्ति की उपासना से जुड़ी है, इसलिए लाल और सफेद रंगों का मेल त्योहार के भावनात्मक और धार्मिक वातावरण से खास तौर पर जुड़ जाता है।
हालांकि, लाल-पाड़ साड़ी पहनना सभी महिलाओं के लिए कोई अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं है। यह मुख्य रूप से बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा और उत्सवी पहचान का हिस्सा है। आज भी पारंपरिक पहनावे को पसंद करने वाली महिलाएं दुर्गा पूजा के दौरान इस साड़ी को खास प्राथमिकता देती हैं।
धुनुची नृत्य से सिंदूर खेला तक, हर रस्म की अपनी पहचान
बंगाल की दुर्गा पूजा कई अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। पूजा के दौरान धुनुची नृत्य में श्रद्धालु धूप से भरे धुनुची पात्र के साथ देवी के सामने नृत्य करते हैं। यह रस्म उत्साह, भक्ति और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।
वहीं, विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। इसके बाद देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस तरह दुर्गा पूजा की शुरुआत से लेकर विदाई तक प्रत्येक परंपरा बंगाल की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखती है।
महालया क्यों है बंगाल के लिए भावनाओं से जुड़ा दिन?
महालया बंगाल में पूर्वजों के स्मरण, देवी की आराधना और उत्सव की प्रतीक्षा का संगम है। एक ओर तर्पण के जरिए लोग अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, तो दूसरी ओर चक्षुदान और महिषासुरमर्दिनी जैसी परंपराएं दुर्गा पूजा के आगमन का एहसास कराती हैं। लाल-पाड़ साड़ी, धुनुची नृत्य और सिंदूर खेला जैसी रस्में इस पर्व को सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि इसे बंगाल की सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं।