नई दिल्ली - आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के साथ कंप्यूटिंग पावर और बिजली की जरूरत भी लगातार बढ़ रही है। इसी चुनौती को देखते हुए गूगल अब कंप्यूटिंग के लिए धरती से आगे अंतरिक्ष की ओर देखने की तैयारी कर रही है। कंपनी Project Suncatcher के तहत यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों के जरिए बड़े पैमाने पर AI कंप्यूटिंग की जा सकती है।
अंतरिक्ष में लगाए जाएंगे AI चिप्स
गूगल की योजना पृथ्वी की कक्षा में घूमने वाले सैटेलाइट्स में अपनी Trillium Tensor Processing Units (TPUs) लगाने की है। इन विशेष चिप्स की मदद से अंतरिक्ष में AI से जुड़े कंप्यूटिंग कार्यों को संचालित करने की संभावना परखने का प्रयास किया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी अपने शुरुआती ऑर्बिटल टेस्ट के लिए एक प्रोटोटाइप सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इसे SpaceX के Falcon 9 रॉकेट के जरिए कक्षा में भेजा जाएगा। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में AI कंप्यूटिंग सिस्टम कितनी विश्वसनीयता और स्थिरता के साथ काम कर सकता है।
एलन मस्क ने भी जताई दिलचस्पी
प्रोजेक्ट से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद एलन मस्क ने भी इस विचार पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने गूगल के प्रोजेक्ट से संबंधित वीडियो साझा करते हुए भविष्य में कंप्यूटिंग के बड़े हिस्से के अंतरिक्ष में स्थानांतरित होने की संभावना का उल्लेख किया। हालांकि, अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग का विचार अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है और इसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई तकनीकी चुनौतियों का समाधान करना होगा।
अंतरिक्ष में ज्यादा सौर ऊर्जा मिलने का दावा
गूगल के मुताबिक, लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद सैटेलाइट्स को धरती पर स्थित कई स्थानों की तुलना में अधिक समय तक सीधे सूर्य की रोशनी मिल सकती है। कंपनी का अनुमान है कि उपयुक्त परिस्थितियों में अंतरिक्ष आधारित सिस्टम धरती पर मौजूद डेटा सेंटर की तुलना में कई गुना ज्यादा सौर ऊर्जा हासिल कर सकते हैं।
अगर यह तकनीक व्यावहारिक साबित होती है, तो भविष्य में AI के लिए बिजली की बढ़ती मांग, जमीन की जरूरत और डेटा सेंटर की कूलिंग जैसी चुनौतियों से निपटने के नए विकल्प मिल सकते हैं।
रेडिएशन और गर्मी सबसे बड़ी चुनौती
अंतरिक्ष में AI चिप्स चलाना आसान नहीं होगा। वहां मौजूद रेडिएशन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा तापमान में अत्यधिक बदलाव भी हार्डवेयर के लिए चुनौती बन सकता है। गूगल ने बताया है कि Trillium TPU से जुड़े वाइब्रेशन और रेडिएशन परीक्षण किए गए हैं। शुरुआती प्रयोगों से संकेत मिले हैं कि चिप्स लंबे समय तक रेडिएशन के प्रभाव को झेलने की क्षमता दिखा सकती हैं।
एक अन्य बड़ी समस्या कंप्यूटिंग के दौरान पैदा होने वाली गर्मी को बाहर निकालना है। अंतरिक्ष में हवा नहीं होने के कारण सामान्य डेटा सेंटर की तरह एयर-कूलिंग संभव नहीं है। इसके लिए गूगल हीट पाइप और रेडिएटर जैसी तकनीकों की संभावनाएं तलाश रही है।
2027 में लेजर कम्युनिकेशन का परीक्षण
गूगल की योजना आने वाले चरण में दो सैटेलाइट्स के बीच लेजर आधारित संचार तकनीक का परीक्षण करने की भी है। प्रस्तावित परीक्षण 2027 में किया जा सकता है। इसके जरिए अंतरिक्ष में मौजूद कंप्यूटिंग सिस्टम के बीच तेज डेटा ट्रांसफर की क्षमता परखी जाएगी। कंपनी ने Project Suncatcher की घोषणा पिछले साल की थी। शुरुआती मिशन को सैटेलाइट कंपनी Planet के साथ साझेदारी में तैयार किया जा रहा है। यदि प्रयोग सफल होते हैं, तो भविष्य में AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग एक नई दिशा खोल सकती है।