ओडिशा के कालाहांडी जिले से एक बेहद अनोखा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां एक व्यक्ति ने बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान, अभिनेता ऋतिक रोशन, एक बड़ी कोल्ड ड्रिंक कंपनी और विज्ञापन परिषद के खिलाफ उपभोक्ता अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है। मामला सुनने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे एक बच्चे की हार और उससे जुड़ी भावनात्मक निराशा को वजह बताया गया है। यह केस अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है।
बेटे ने विज्ञापन पर किया भरोसा
खरियार क्षेत्र के रहने वाले दीपक दुबे ने अदालत में दावा किया है कि उनके बेटे ने टीवी पर प्रसारित एक कोल्ड ड्रिंक का विज्ञापन देखा था। विज्ञापन में दिखाया गया था कि यह पेय पीने से ताकत और फुर्ती बढ़ जाती है। बच्चे ने इस बात को सच मान लिया और विद्यालय में आयोजित दौड़ प्रतियोगिता से पहले उसी कोल्ड ड्रिंक का सेवन किया। परिवार को उम्मीद थी कि बच्चा अच्छा प्रदर्शन करेगा, लेकिन परिणाम इसके उलट रहा और वह प्रतियोगिता नहीं जीत पाया।
हार के बाद टूट गया बच्चे का मनोबल
दीपक दुबे का कहना है कि रेस हारने के बाद उनका बेटा मानसिक रूप से काफी निराश हो गया। पिता का आरोप है कि विज्ञापन में दिखाई गई बातों ने बच्चे के मन में अवास्तविक उम्मीदें पैदा कर दी थीं। उनका मानना है कि इस तरह के प्रचार बच्चों के मनोविज्ञान पर असर डालते हैं और उन्हें गलत संदेश देते हैं। इसी वजह से उन्होंने इसे केवल व्यक्तिगत मामला न मानते हुए उपभोक्ता अधिकारों और भ्रामक विज्ञापनों का मुद्दा बनाया है।
एक रुपये के हर्जाने ने खींचा ध्यान
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा उस मांग की हो रही है जो शिकायतकर्ता ने अदालत के सामने रखी है। दीपक दुबे ने हर्जाने के तौर पर केवल एक रुपये की मांग की है। उनका कहना है कि उनका मकसद आर्थिक लाभ हासिल करना नहीं बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना है। वह चाहते हैं कि कंपनियां और विज्ञापन एजेंसियां ऐसे दावे करने से बचें जो बच्चों और आम लोगों को भ्रमित कर सकते हैं।
अदालत में शुरू हुई कानूनी लड़ाई
मामले की पहली सुनवाई उपभोक्ता अदालत में 22 दिसंबर को हो चुकी है, जबकि अगली सुनवाई 19 जनवरी को निर्धारित की गई है। अदालत में सलमान खान की ओर से अधिवक्ता अनीश पटनायक पक्ष रख रहे हैं। वहीं अभिनेता ऋतिक रोशन और संबंधित कंपनी की ओर से कुणाल बेहेरा तथा विज्ञापन परिषद की ओर से अमित जैन अदालत में पैरवी कर रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में विज्ञापनों की विश्वसनीयता और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।
भ्रामक विज्ञापनों पर फिर उठे सवाल
यह घटना एक बार फिर इस सवाल को सामने लेकर आई है कि क्या विज्ञापनों में किए जाने वाले दावे पूरी तरह जिम्मेदारी के साथ पेश किए जाते हैं। खासतौर पर बच्चों को प्रभावित करने वाले प्रचार को लेकर विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं। अदालत का अंतिम फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन इस मामले ने मनोरंजन, विज्ञापन और उपभोक्ता अधिकारों के बीच संतुलन की बहस को जरूर तेज कर दिया है।