अयोध्या, 13 अगस्त 2026 | अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की पूजा करने वाले पुजारियों की वेशभूषा में आज से बड़ा बदलाव लागू हो गया है। नए ड्रेस कोड के तहत पुजारी अब गर्भगृह में बिना सिले हुए परंपरागत वस्त्र धारण करेंगे। उनके लिए पीतांबरी उत्तरीय और धोती को अनिवार्य किया गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की पुनर्गठित धार्मिक न्यास समिति की पहली बैठक में पुजारियों की वेशभूषा पर विचार किया गया था। बैठक में शामिल संतों ने सिली हुई चौबंदी वाले पुराने ड्रेस कोड पर आपत्ति जताते हुए इसे अयोध्या की वैष्णव परंपरा के अनुकूल नहीं माना था। इसके बाद बिना सिलाई वाले वस्त्र लागू करने का निर्णय लिया गया।
आज से पुजारी क्या पहनेंगे?
नई व्यवस्था में रामलला के पुजारियों को पीले रंग का बिना सिला उत्तरीय और धोती पहननी होगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार चौबंदी जैसे सिले हुए ऊपरी वस्त्र को नई व्यवस्था से हटा दिया गया है। पीतांबरी उत्तरीय एक ऐसा परंपरागत कपड़ा है, जिसे शरीर के ऊपरी हिस्से पर ओढ़ा जाता है। धोती भी बिना सिलाई वाला पारंपरिक वस्त्र है। धार्मिक न्यास समिति का कहना है कि गर्भगृह में पूजा-अर्चना के दौरान वेशभूषा मंदिर की वैष्णव मर्यादा और परंपरागत आचार के अनुरूप होनी चाहिए।
पहले क्या था पुजारियों का ड्रेस कोड?
पुरानी व्यवस्था के तहत पुजारियों को पीले रंग की चौबंदी, धोती और पगड़ी धारण करनी होती थी। चौबंदी एक सिला हुआ कुर्तानुमा परिधान है, जिसे डोरी की सहायता से बांधा जाता है। मंदिर ट्रस्ट ने पुजारियों को निर्धारित वर्दी भी उपलब्ध कराई थी। हाल की व्यवस्था में पुजारियों को पीत रंग की चौबंदी के साथ सफेद धोती और पगड़ी दी गई थी। चौबंदी पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का मोनोग्राम भी छापा गया था। गर्मी और सर्दी के मौसम के अनुसार पुजारियों के लिए अलग-अलग ड्रेस उपलब्ध कराई गई थी।
क्यों बदला गया ड्रेस कोड?
धार्मिक न्यास समिति के सदस्यों का मत था कि मंदिर के गर्भगृह में श्रीविग्रह की सेवा और पूजा करते समय प्राचीन वैष्णव आचार का पालन किया जाना चाहिए। समिति ने सिले हुए वस्त्रों के स्थान पर बिना सिलाई वाले परंपरागत वस्त्र पहनने का सुझाव दिया।
राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद देव गिरि और अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन ने संतों के सुझाव पर सहमति जताई। बैठक के बाद पुजारियों के लिए बदली हुई व्यवस्था के निर्देश जारी कर दिए गए।
धार्मिक न्यास समिति के सदस्य स्वामी राजकुमार दास ने कहा कि गर्भगृह में पूजा के दौरान धार्मिक मर्यादा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने बिना सिले पीतांबरी उत्तरीय और धोती को वैष्णव परंपरा के अधिक अनुकूल बताया। यह समिति के सदस्य का धार्मिक और परंपरागत मत है।
13 अगस्त से ही क्यों लागू हुई व्यवस्था?
नया ड्रेस कोड सावन शुक्ल प्रतिपदा, यानी आज 13 अगस्त से प्रभावी किया गया है। इसकी एक वजह पुजारियों की ड्यूटी का रोस्टर बताया गया है।
रामलला के पुजारियों की सुबह और शाम की पालियों का रोस्टर प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास बदला जाता है। सावन कृष्ण अमावस्या तक सुबह की पाली में सेवा करने वाला समूह शुक्ल प्रतिपदा से शाम की पाली में जाएगा, जबकि शाम की पाली वाला समूह सुबह की सेवा संभालेगा। इसी बदलाव के साथ नया ड्रेस कोड लागू किया गया है।
एक महीने के भीतर दूसरी बार चर्चा में आया ड्रेस कोड
राम मंदिर के पुजारियों की निर्धारित वेशभूषा को हाल में सभी पुजारियों के लिए अधिक सख्ती से लागू किया गया था। पीत रंग की चौबंदी, धोती और पगड़ी वाली व्यवस्था का उद्देश्य पुजारियों की एक समान पहचान बनाना और श्रद्धालुओं के लिए उन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाना बताया गया था।
इसके बाद धार्मिक न्यास समिति ने पोशाक को परंपरागत पूजा पद्धति की कसौटी पर दोबारा परखा। समिति की आपत्ति के बाद एकरूपता के लिए लागू चौबंदी की जगह अब बिना सिले वस्त्रों को प्राथमिकता दी गई है।
क्या श्रद्धालुओं के लिए भी बदला ड्रेस कोड?
मौजूदा बदलाव केवल राम मंदिर के पुजारियों और गर्भगृह में पूजा-अर्चना करने वाले अर्चकों की वेशभूषा से संबंधित है। श्रद्धालुओं के लिए इसी आदेश के तहत कोई नया अनिवार्य ड्रेस कोड घोषित होने की जानकारी नहीं है।
ट्रस्ट पहले श्रद्धालुओं से मंदिर की गरिमा के अनुरूप भारतीय और शालीन परिधान पहनकर आने की अपील कर चुका है। पुरुषों को धोती-कुर्ता और महिलाओं को साड़ी जैसे पारंपरिक वस्त्र पहनने की सलाह दी गई थी, लेकिन इसे सभी सामान्य दर्शनार्थियों के लिए बाध्यकारी नियम नहीं बताया गया था।
पुजारियों की पूजा पद्धति और आचरण पर भी बन रहे नियम
धार्मिक न्यास समिति पुजारियों की वेशभूषा के साथ पूजा-पद्धति, आचार-व्यवहार, भगवान के श्रृंगार, भोग और आरती से जुड़ी व्यवस्थाओं पर भी विचार कर रही है। हाल की बैठक में पुजारियों के बाल रखने या मुंडन कराने जैसे विषयों पर भी दिशा-निर्देशों की चर्चा सामने आई थी।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य मंदिर में पूजा-अर्चना को एक समान धार्मिक पद्धति और तय अनुशासन के तहत संचालित करना बताया गया है। अलग-अलग नियमों का अंतिम स्वरूप ट्रस्ट और धार्मिक समिति के विस्तृत निर्देशों से स्पष्ट होगा।