उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश और बिहार में विधान परिषद की सीटों पर मतगणना जारी है। उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर 152 उम्मीदवारों, जबकि बिहार की 8 सीटों पर 150 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला होना है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के इन चुनावों में वोटों की गिनती सामान्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों से अलग तरीके से की जाती है। यहां सिर्फ सबसे ज्यादा वोट हासिल करना ही जीत की गारंटी नहीं है, बल्कि मतदाताओं की ओर से दी गई वरीयताओं की भी अहम भूमिका होती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि एमएलसी चुनाव में मतगणना की प्रक्रिया क्या है और पहली, दूसरी वरीयता के वोटों से कैसे तय होता है परिणाम।
उत्तर प्रदेश और बिहार में एमएलसी चुनाव की मतगणना
उत्तर प्रदेश और बिहार में विधान परिषद की सीटों के लिए हो रही मतगणना पर सभी की नजरें टिकी हैं। उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर 152 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं, जबकि बिहार की 8 सीटों के लिए 150 प्रत्याशियों के बीच मुकाबला है। इन चुनावों में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इन निर्वाचन क्षेत्रों की चुनावी प्रक्रिया सामान्य विधानसभा या लोकसभा चुनाव से काफी अलग होती है। यहां मतदान के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है और मतदाताओं को अपनी पसंद के उम्मीदवारों की वरीयता दर्ज करनी होती है। मतगणना के दौरान इन्हीं वरीयताओं के आधार पर वोटों का हिसाब लगाया जाता है। यही वजह है कि इन चुनावों के नतीजे समझने के लिए मतगणना की पूरी प्रक्रिया जानना जरूरी है।
एमएलसी चुनाव में कैसे डाले जाते हैं वोट?
विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। मतदाता को बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के नाम के सामने अपनी पसंद के क्रम में अंक दर्ज करने होते हैं। पहली पसंद वाले उम्मीदवार के सामने '1' लिखा जाता है, जबकि दूसरी पसंद के लिए '2' और तीसरी पसंद के लिए '3' अंकित किया जाता है। मतदाता चाहें तो नियमों के अनुसार अन्य उम्मीदवारों को भी अपनी वरीयता दे सकते हैं। इस प्रक्रिया में केवल एक उम्मीदवार को वोट देने के बजाय पसंद का क्रम बताने का विकल्प मिलता है। मतगणना के दौरान सबसे पहले पहली वरीयता के मतों को गिना जाता है। यदि इस चरण में किसी उम्मीदवार को जीत के लिए जरूरी कोटा नहीं मिलता, तो आगे की वरीयताओं के आधार पर भी परिणाम तय किया जा सकता है।
सबसे पहले बैलेट पेपर की जांच, अवैध वोट होंगे अलग
मतदान समाप्त होने के बाद मतपेटियों को मतगणना केंद्र पर लाया जाता है, जहां मतपत्रों को व्यवस्थित करके गिनती की तैयारी की जाती है। सबसे पहले बैलेट पेपर की वैधता की जांच की जाती है, ताकि नियमों के मुताबिक डाले गए वोटों को ही गिनती में शामिल किया जा सके। जिन मतपत्रों पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, उन्हें नियमों के अनुसार अवैध घोषित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि मतदाता ने पहली वरीयता के लिए एक से अधिक उम्मीदवारों के सामने '1' लिखा है, तो उसका मतपत्र अमान्य हो सकता है। इसी तरह गलत तरीके से वरीयता दर्ज करने या जरूरी निर्देशों का पालन नहीं करने पर भी मतपत्र की वैधता प्रभावित हो सकती है। जांच पूरी होने के बाद वैध मतपत्रों को अलग किया जाता है और उनकी गिनती शुरू होती है। यह चरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि आगे की पूरी गणना वैध मतों के आधार पर ही की जाती है।
पहली वरीयता के वोटों से शुरू होती है मतगणना
एमएलसी चुनाव की मतगणना में सबसे पहले प्रत्येक उम्मीदवार को मिले पहली वरीयता के वोटों की गिनती की जाती है। इससे पता चलता है कि शुरुआती चरण में किस प्रत्याशी को मतदाताओं का कितना समर्थन मिला है। इसके बाद चुनाव में भरी जाने वाली सीटों और कुल वैध मतों के आधार पर जीत के लिए आवश्यक कोटा निर्धारित किया जाता है। यदि कोई उम्मीदवार निर्धारित कोटा हासिल कर लेता है, तो लागू चुनावी नियमों के अनुसार उसे विजेता घोषित किया जा सकता है। हालांकि, पहली वरीयता के वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी हर चुनाव में विजेता का फैसला हो जाए, यह जरूरी नहीं है। कई बार किसी भी प्रत्याशी को जीत के लिए जरूरी संख्या नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में मतगणना अगले चरण में पहुंचती है, जहां उम्मीदवारों की स्थिति और मतपत्रों पर दर्ज अगली वरीयताओं को देखा जाता है।
कितने वोट मिलने पर उम्मीदवार को मिलती है जीत?
एमएलसी चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या निर्वाचन क्षेत्र और चुनाव में भरी जाने वाली सीटों के अनुसार तय होती है। इसलिए हर चुनाव में जीत का एक ही आंकड़ा लागू नहीं किया जा सकता। एक सीट वाले निर्वाचन क्षेत्र में जहां एक ही प्रतिनिधि का चुनाव होना है, वहां सामान्यतः कुल वैध मतों के आधे से अधिक वोट हासिल करना जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, यदि कुल 20,000 वैध मत पड़े हैं, तो इस स्थिति में जीत के लिए 10,001 वोटों की जरूरत होगी। लेकिन एक से अधिक सीटों वाले चुनाव में कोटा निर्धारित करने की प्रक्रिया अलग हो सकती है। ऐसे चुनावों में निर्धारित गणना पद्धति और लागू नियमों के अनुसार जीत का आंकड़ा तय किया जाता है। यही कारण है कि उम्मीदवारों को मिले कुल वोटों के साथ-साथ निर्धारित कोटा समझना भी जरूरी है। केवल दूसरे प्रत्याशी से अधिक वोट मिलना हर परिस्थिति में जीत सुनिश्चित नहीं करता।
पहली गिनती में कोटा नहीं मिला तो क्या होगा?
यदि पहली वरीयता के वोटों की गिनती के बाद कोई भी उम्मीदवार निर्धारित जीत का कोटा हासिल नहीं कर पाता, तो मतगणना में अगला चरण शुरू हो सकता है। इस दौरान सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार की स्थिति देखी जाती है और लागू नियमों के तहत उसे मुकाबले से बाहर किया जा सकता है। इसके बाद उस उम्मीदवार के मतपत्रों पर दर्ज अगली वैध वरीयताओं की जांच की जाती है। मतपत्रों पर मौजूद दूसरी पसंद के आधार पर संबंधित वोटों को बाकी उम्मीदवारों के खाते में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के बाद सभी उम्मीदवारों के मतों की दोबारा गणना की जाती है। यदि किसी प्रत्याशी को आवश्यक कोटा मिल जाता है, तो उसके विजेता बनने का रास्ता साफ हो सकता है। लेकिन यदि फिर भी कोई उम्मीदवार निर्धारित संख्या तक नहीं पहुंचता, तो नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया जारी रखी जाती है।
दूसरी और तीसरी वरीयता कैसे बदल सकती है चुनाव का परिणाम?
वरीयता आधारित मतगणना की सबसे खास बात यह है कि इसमें मतदाता की दूसरी और आगे की पसंद भी महत्वपूर्ण हो सकती है। पहली वरीयता के आधार पर सबसे पीछे रहने वाला उम्मीदवार बाहर होने पर उसके मतपत्रों पर दर्ज अगली वैध वरीयता देखी जाती है। यदि किसी मतपत्र पर दूसरे स्थान पर मौजूद उम्मीदवार को वरीयता दी गई है, तो लागू नियमों के अनुसार उस वोट का लाभ संबंधित प्रत्याशी को मिल सकता है। इस तरह शुरुआती दौर में कम वोट पाने वाला उम्मीदवार भी आगे की गणना में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है। हालांकि, हर मतपत्र का स्थानांतरण निर्धारित नियमों के अनुसार ही होता है और सभी मतपत्रों का उपयोग हर चरण में एक समान तरीके से नहीं किया जाता। जरूरत पड़ने पर सबसे कम वोट वाले अगले उम्मीदवार को भी बाहर किया जा सकता है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रह सकती है, जब तक जीत का कोटा पूरा नहीं हो जाता या लागू नियमों के अनुसार परिणाम निर्धारित नहीं हो जाता।
विधायक और सांसद के चुनाव से कैसे अलग है एमएलसी की काउंटिंग?
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सामान्यतः प्रत्येक सीट पर सबसे अधिक वैध वोट हासिल करने वाला उम्मीदवार विजेता बनता है। इसके विपरीत, शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के एमएलसी चुनाव में वरीयता आधारित मतदान और निर्धारित कोटे की अहम भूमिका होती है। यहां मतदाता केवल अपनी पहली पसंद ही नहीं, बल्कि अन्य पसंदीदा उम्मीदवारों का क्रम भी दर्ज कर सकते हैं। पहली वरीयता की गिनती के बाद जरूरत पड़ने पर मतपत्रों पर दर्ज अगली वरीयताओं के आधार पर वोटों का स्थानांतरण किया जाता है। इसी कारण इन चुनावों में मतगणना की प्रक्रिया अधिक विस्तृत हो सकती है। इसके अलावा बैलेट पेपर की जांच और मतों की कई चरणों में गणना करने में भी समय लगता है। यही वजह है कि एमएलसी चुनावों के अंतिम नतीजे आने में लोकसभा या विधानसभा चुनावों की तुलना में अधिक समय लग सकता है।
क्यों खास है एमएलसी चुनाव की मतगणना?
एमएलसी चुनाव की मतगणना केवल वोटों की गिनती तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें मतदाता की वरीयता और जीत के लिए जरूरी कोटे का भी विशेष महत्व होता है। पहली पसंद के वोट उम्मीदवार की शुरुआती स्थिति बताते हैं, जबकि आगे की वरीयताएं मुकाबले की दिशा बदल सकती हैं। यही प्रक्रिया इस चुनाव को सामान्य प्रत्यक्ष चुनावों से अलग बनाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जारी मतगणना के दौरान उम्मीदवारों की जीत-हार का फैसला इसी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा। हालांकि, मतों के स्थानांतरण और जीत के कोटे से जुड़े नियम निर्वाचन क्षेत्र की प्रकृति के अनुसार लागू होते हैं। इसलिए किसी भी उम्मीदवार की बढ़त को अंतिम जीत मानने से पहले आधिकारिक परिणाम का इंतजार करना जरूरी है। अंतिम नतीजे घोषित होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि किन उम्मीदवारों ने विधान परिषद में अपनी जगह बनाई है।