रुड़की - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय स्थित टोली झील पर किए गए एक अध्ययन में ऐसे प्रमाण जुटाए हैं, जो इस क्षेत्र में मानव की मौजूदगी के इतिहास को नई दिशा दे सकते हैं। शोध के दौरान झील की तलछट के विश्लेषण में करीब 8,300 वर्ष पुराने मानव डीएनए के संकेत मिले हैं। यदि आगे के अध्ययनों में इन निष्कर्षों की पुष्टि होती है, तो गढ़वाल हिमालय में मानव उपस्थिति का समय पहले के अनुमान से कहीं अधिक पुराना माना जा सकता है।
15 हजार वर्षों के पर्यावरणीय बदलाव का मिला रिकॉर्ड
शोधकर्ताओं ने टोली झील की तलछट का विस्तृत अध्ययन किया, जिसमें लगभग 15,000 वर्षों के जलवायु परिवर्तन, वनस्पति, सूक्ष्म जीवों, प्राकृतिक आग की घटनाओं और मानव गतिविधियों से जुड़े संकेत दर्ज मिले। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रकार की तलछट प्राकृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अभिलेख होती है, जिससे हजारों वर्षों में हुए पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने में मदद मिलती है।
मानव इतिहास को लेकर सामने आए नए संकेत
अध्ययन में सबसे अहम खोज करीब 8,300 वर्ष पुराने सेडिमेंट में मानव डीएनए के अवशेषों के संकेत हैं। अब तक उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर गढ़वाल हिमालय में मानव बसावट का इतिहास लगभग 3,000 वर्ष पुराना माना जाता था। नए शोध से यह संभावना सामने आई है कि इस क्षेत्र में इंसानों की मौजूदगी लगभग 5,000 वर्ष पहले से भी रही हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि उस समय यहां रहने वाले लोग संभवतः घुमंतू या मौसमी प्रवासी रहे होंगे, इसलिए उनके स्थायी निवास के स्पष्ट पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं।
2022 में शुरू हुआ था शोध कार्य
यह अध्ययन वर्ष 2022 में शुरू किया गया था। शोध का नेतृत्व आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव और जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर नवीन कुमार नवानी ने किया। शोधार्थी सुष्मिता सिंह ने इस अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शोध से जुड़े निष्कर्ष साझा किए।
जलवायु परिवर्तन का भी मिला विस्तृत रिकॉर्ड
शोध के अनुसार, लगभग 15,000 से 9,500 वर्ष पहले यह क्षेत्र अत्यधिक ठंडा और शुष्क था। इसके बाद भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून मजबूत हुआ, जिससे 9,500 से 3,600 वर्ष पहले यहां गर्म और आर्द्र परिस्थितियां विकसित हुईं तथा झील का जलस्तर ऊंचा बना रहा। करीब 3,600 वर्ष पहले के बाद जलवायु फिर अपेक्षाकृत शुष्क होने लगी।
प्रकृति और जीव-जंतुओं में बदलाव के भी मिले प्रमाण
वैज्ञानिकों ने सेडिमेंटरी एंशिएंट डीएनए (Sedimentary Ancient DNA) तकनीक की सहायता से यह भी पाया कि हजारों वर्षों के दौरान इस क्षेत्र के पौधों, सूक्ष्म जीवों और अन्य जैविक संरचनाओं में लगातार परिवर्तन हुआ। इससे संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ा।
हिमालय के इतिहास को समझने में मिलेगी नई दिशा
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि हिमालय की अन्य झीलों में भी इसी तरह के वैज्ञानिक अध्ययन किए जाएं, तो यह समझना आसान होगा कि मानव इस पर्वतीय क्षेत्र में कब पहुंचे, किस प्रकार यहां रहे और समय के साथ पर्यावरण एवं जलवायु पर उनका क्या प्रभाव पड़ा। यह शोध हिमालय के प्राचीन इतिहास और जलवायु परिवर्तन को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।