नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल के चर्चित सिंगूर नैनो कार परियोजना मामले में राज्य सरकार को देश की शीर्ष अदालत से करारा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्यस्थता (Arbitral) अदालत के उस फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी, जिसमें टाटा मोटर्स को ₹765.78 करोड़ का मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कोलकाता हाई कोर्ट के पुराने आदेश को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे से जुड़े इस कानूनी विवाद की सुनवाई अब कोलकाता हाई कोर्ट में ही होगी। हाई कोर्ट में जस्टिस अनिरुद्ध रॉय की पीठ 12 अगस्त को इस मामले की अगली सुनवाई करेगी।
क्या था मध्यस्थता अदालत का आदेश?
30 अक्टूबर, 2023 को तीन सदस्यीय मध्यस्थता अदालत ने फैसला सुनाया था कि सिंगूर में कारखाना नहीं बन पाने के कारण पश्चिम बंगाल सरकार को टाटा मोटर्स को ₹765.78 करोड़ का मुआवजा देना होगा। इसके अलावा, 1 सितंबर, 2016 से पूरी राशि मिलने तक 11% वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया था।
राज्य सरकार के आरोप और कानूनी लड़ाई
पश्चिम बंगाल सरकार ने मध्यस्थता अदालत के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी.एस. सिरपुरकर पर पक्षपात का आरोप लगाया था। राज्य का दावा था कि सुनवाई के दौरान वे टाटा समूह के विभिन्न कार्यक्रमों में देखे गए थे। हालांकि, कोलकाता हाई कोर्ट ने 19 जून को इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना है।
सिंगूर विवाद की पृष्ठभूमि
2006: तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर में टाटा की नैनो कार फैक्ट्री के लिए 1000 एकड़ जमीन आवंटित की थी।
विरोध और विस्थापन: ममता बनर्जी के नेतृत्व में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बड़े आंदोलन के बाद टाटा को अपनी परियोजना वहां से समेटनी पड़ी।
मुआवजे की मांग: जब राज्य सरकार ने जमीन वापस मांगी, तो टाटा मोटर्स ने निवेश की गई राशि और खर्चों के बदले मुआवजे की मांग की, जिसे राज्य ने ठुकरा दिया था।
अब सबकी नजरें 12 अगस्त को होने वाली कोलकाता हाई कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां मुआवजे की अंतिम रूपरेखा तय होगी।