CG NEWS : रायपुर। मानवविज्ञान अध्ययनशाला पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर एवं भारतीय सांस्कृतिक निधि रायपुर अध्याय के संयुक्त तत्वाधान में आज "तालाब हमारी धरोहर एवं छत्तीसगढ़ की नदी घाटी सभ्यताएं: संरक्षण एवं चुनौतियां" विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस आयोजन के मुख्य अतिथि एस के पांडे, पूर्व कुलपति पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, मुख्य वक्ता के रूप में देश के जाने-माने कृषि शास्त्री डॉक्टर दिनेश के मरोठिया तथा कार्यशाला के अध्यक्ष के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के माननीय कुलपति प्रोफेसर सच्चिदानंद शुक्ला उपस्थित थे। इस कार्यशाला का मानवविज्ञान अध्ययनशाला के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार प्रेमी तथा इंटैक रायपुर चैप्टर के संयोजक डॉ. राकेश तिवारी के संयुक्त संयोजन में संपन्न हुआ।
विषयों पर भी तालाबों एवं जल स्रोतों के महत्व को समझाया
इस कार्यशाला में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर सच्चिदानंद शुक्ला ने सांस्कृतिक धरोहरों के बारे में तथा इनके संरक्षण पर आने वाली चुनौतियों के बारे में चर्चा की और कुलपति ने अपने बचपन की और पिछली पीढ़ियों के लिए तालाबों के महत्व से जुड़ी बातें साझा की। धरोहर संस्कृति का परिचायक होता है एवं अन्य विषयों पर भी तालाबों एवं जल स्रोतों के महत्व को समझाया। हम अपनी धरोहर को जीवन से कैसे जोड़ते हैं इस विषय पर चर्चा की वहीं वर्तमान पीढ़ी को अपनी विरासत का ध्वज वाहक की संज्ञा देते हुए जागरूक करना विद्यालय और विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी सीख दी। कार्यशाला के प्रतिभागियों के स्वागत उद्बोधन में डॉ. राकेश तिवारी ने नदी एवं तालाबों के महत्व एवं संरक्षण की बातें कही गई। कार्यशाला का परिचय देते हुए प्रोफेसर जितेंद्र कुमार प्रेमी ने कहा कि तालाब हमारी धरोहर विषय को चुनने के कारण को बताते हुए जल स्रोतों पर जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण आदि के प्रभावों को वर्णित किया और इन्हें संरक्षित करने में आने वाली चुनौतियों के बारे में होने वाली चर्चा का प्रस्तावना प्रस्तुत किया।प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सभी प्रयास करे
कार्यशाला के मुख्य वक्ता डॉ मरोठिया ने अपने व्याख्यान में बताया कि तालाबों और नदी प्रणालियों की संरक्षण रणनीतियों में पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं को कैसे एकीकृत किया जाए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक संसाधनों के सामाजिक पारिस्थितिक आर्थिक सांस्कृतिक उपयोग और अमूल्य मूल्यों को राज्य की सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाना चाहिए उनकी राय में तालाबों और नदियों की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को एकीकृत किए बिना एसडीजी हासिल नहीं किया जा सकता। राज्य को आने वाली पीढियां के लिए इन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सभी प्रयास करने चाहिए।संसाधन उपलब्ध रहे इसलिए वर्तमान में सभी को जागरूक करना आवश्यक है।
इंटेक छत्तीसगढ़ चैप्टर के संयोजक अरविंद मिश्रा ने इंटेक का परिचय प्रस्तुत किया और इनके मूर्त एवं अमूर्त विभागों के जमीनी तौर पर सांस्कृतिक धरोहरों और उनके संरक्षण से संबंधित गहन चर्चा की। Intech से जुड़ने के लिए मानव विज्ञान अध्ययनशाला से अन्य सत्रों में भी इसी प्रकार के आयोजन करने का आग्रह किया। पूर्व कुलपति डॉ. एसके पांडे ने कहा कि हमें विकास करना है किंतु विकास का अर्थ सर्वनाश नहीं होता ,अतः हमें तालाब को सुरक्षित करके भावी पीढ़ी को सौंपने की बात कही ।धरोहर को परिभाषित करते हुए कहा कि ऐसी चीज जो यादों में बसे हैं और संस्कृति के परिचायक है ।मानव प्रजाति सुरक्षित रहे तथा भावी पीढ़ी के लिए भी संसाधन उपलब्ध रहे इसलिए वर्तमान में सभी को जागरूक करना आवश्यक है।रिन्यूएबल रिकॉर्ड्स में तालाबों को कृषि भूमि बनाकर हड़पने तथा रिकॉर्ड
प्रथम तकनीकी सत्र के अंतर्गत मुख्य वक्ता शिवि जोशी ने रतनपुर पर फोकस किया कंटूर की बातें कहीं। तालाब को संस्कार से जोड़ते हुए तकनीकी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में तालाब का सौंदर्यीकरण उनके अनुसार जुर्म है, क्योंकि तालाब ऐसे ही सुंदर है इनके सुंदरीकरण की आवश्यकता ही नहीं है उनके सामने यह प्रश्न भी आया कि रतनपुर और रायपुर में किसका इतिहास अधिक महत्वपूर्ण है, उत्तर में उन्होंने बताया रतनपुर शहरीकरण से अछूता क्षेत्र है इसलिए ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है किंतु रायपुर का इतिहास भी महत्वपूर्ण है जो शहरीकरण के कारण विक्षुब्ध हो गया है। इस सत्र के दूसरे वक्ता डॉ संजीव खुदशाह ने तालाबों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जारी नियमों को बताया तथा 1930 के दौरान जमीदारों ने रिन्यूएबल रिकॉर्ड्स में तालाबों को कृषि भूमि बनाकर हड़पने तथा रिकॉर्ड में फेर बदल की जानकारी को साझा किया तालाबों के आसपास कैचमेंट एरिया में होने वाली कमी के कारण वर्षा जल संग्रहण में आई कमी से अवगत कराया। दूसरे तकनीकी सत्र में डॉक्टर विशी उपाध्याय क्यूरिटोरियल एसोसिएट बिहार म्यूजियम पटना ने अपने व्याख्यान में छत्तीसगढ़ नदी घाटी सभ्यता के बारे में चर्चा की सन 2022 के पायलट प्रोजेक्ट में जांजगीर चांपा में मिले 90 मिट्टी के किले आदि के बारे में बताया। तालाब जल स्रोतों को बचाने के लिए क्या करना चाहिए इस पर अतिथियों तथा विद्यार्थियों से सुझाव लिया। इस पर नरेंद्र डहरिया मानव विज्ञान अध्ययनशाला के विद्यार्थी द्वारा उत्तर देते हुए यह कहा गया कि पहले उनके समस्याओं को समझना होगा तथा रिन्यूएबल रिकॉर्ड्स के आधार पर तालाबों की पहचान कर उनका संरक्षण करना होगा। द्वितीय सत्र के दूसरे वक्ता श्री जी एल रायकवार ने, आदिम काल से लेकर प्रागैतिहासिक काल तथा वर्तमान समय तक नदी तालाब सरोवर आदि के महत्व पर गहन चर्चा की ,छत्तीसगढ़ की इतिहास के बारे में भी बताया।तालाबों का सौंदर्यीकरण तालाबों की मौत है
उक्त सत्रों के अध्यक्षता कर रहे डॉक्टर एल एस निगम के अनुसार दुनिया में कोई भी देश बिना नदी के जीवित नहीं है, नदी प्राकृतिक संसाधन है ,तालाब मानव निर्मित संसाधन है ,जो मनुष्य आवश्यकता अनुसार बनाता है अतः यह आवश्यक है। तालाब के संरक्षण में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की और कहा कि अगर चुनौतियां स्वीकार कर ले तो संरक्षण की जरूरत ही नहीं है उनके अनुसार तालाबों का सौंदर्यीकरण तालाबों की मौत है ,इन्होंने कहा कि INTACH का मुख्य उद्देश्य तालाब के संरक्षण के लिए प्रयासों पर विचार तथा इन विचारों का क्रियान्वयन है। सन 2011 में इनकी पुस्तक ethno eco tourism के अनुसार निर्जातीय चरित्र पारिस्थितिकी के कारण बने हैं और इन्हें पर्यटको से खतरा है, पर इससे लाभ भी है। यह पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है।मनुष्य के उत्तरजीविता के लिए आवश्यक
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर मिताशी मित्रा ने बताया की शरीर में जिस प्रकार धमनियों के अंदर रक्त प्रवाहित होता है और उसके बिना मनुष्य सांस नहीं ले सकता। इस प्रकार जल भी मनुष्य के उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है। जनसंख्या विस्फोट के कारण प्रकृति एवं संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव पर उन्होंने चर्चा की और छात्रों से तालाबों के दोहन विषय पर प्रोजेक्ट बनाने तथा उनके समुचित दस्तावेजीकरण करने का आग्रह किया।Read More: CG NEWS: नक्सलियों की बौखलाहट फिर आई सामने, पुलिस मुखबिर के शक में उपसरपंच को उतारा मौत के घाट
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