भारत के मध्य में हाई लेवल पावर का संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष नेताओं के बीच नहीं है। पावर का यह झगड़ा मध्य प्रदेश में आईएएस और आईएफएस अफसरों के बीच है। भारतीय वन सेवा के अधिकारी मध्य प्रदेश सरकार के एक विवादास्पद आदेश को चुनौती दे रहे हैं, जिससे उनके अधिकार कमजोर होंगे। आईएफएस अफसरों के बीच यह संशय है कि नया आदेश पर्यावरण मंजूरियों को प्रभावित करने का एक सीक्रेट प्रयास है, यह देखते हुए कि कई नौकरशाहों ने टाइगर रिजर्व्स और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के पास ज़मीन का अधिग्रहण किया है।
बढ़ रहा है टकराव
इस आदेश को लेकर वन सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में टकराव है। वहीं, इसे लेकर आईएफएस अधिकारियों का दावा है कि यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना है। मध्य प्रदेश आईएफएस एसोसिएशन (एमपीआईएफएसए) ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के समक्ष औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। एसोसिएशन ने वन्यजीव संरक्षण में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया है। साथ ही चेतावनी दी है कि नया आदेश न केवल वन अधिकारियों का मनोबल गिराएगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई प्रमुख पर्यावरणीय पहलों की सफलता को भी खतरे में डाल देगा।
यह है आदेश
दरअसल, 29 जून, 2024 को मध्य प्रदेश सरकार ने एक आदेश जारी कर आईएफएस अधिकारियों के लिए वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (एपीएआर) चैनल को प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) से बदलकर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) कर दिया। एमपीआईएफएसए के अनुसार, यह परिवर्तन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करता है। नए आदेश में एपीएआर प्रक्रिया में अन्य सेवाओं (एसीएस/पीएस) के अधिकारियों को भी शामिल किया गया है, जो कि वन विभाग के भीतर रिपोर्टिंग अधिकारियों के वरिष्ठ अधिकारी होने की आवश्यकता के विपरीत है।
यह है सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में, मध्य प्रदेश सरकार ने 21 दिसंबर, 2000 को एपीसीसीएफ के स्तर तक के आईएफएस अधिकारियों के लिए रिपोर्टिंग, समीक्षा और स्वीकृति अधिकारियों के संबंध में एक आदेश जारी किया। यह आदेश वर्तमान एपीएआर लेखन चैनल का आधार बना।
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