चंदेरी साड़ियां, ये नाम ही अपने आप में एक कहानी है। ज़मीन पर उगती खुशबू और इतिहास की छांव में पनपी ये साड़ियां, परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संगम हैं, जो हर महिला के सौंदर्य को एक नई पहचान देती हैं। इनकी मुलायम रेशमी फिनिश और आकर्षक कढ़ाई, जैसे मानो हर धागे में ऐतिहासिक कला और शिल्प का समर्पण हो। इनमें पारंपरिक भारतीय बुनाई की कला और रचनात्मकता की झलक मिलती है। यही वजह है कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव चंदेरी गए तो उन्होंने अपने लिए भी खरीदारी की।
कहां हैं चंदेरी
यह जगह मध्यप्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित है। चंदेरी की पहचान यहां की कशीदाकारी और चंदेरी साड़ियों के लिए है। यहां की चंदेरी साड़ियां भारत के साथ-साथ विदेश में भी प्रसिद्ध हैं। चंदेरी फेब्रिक एवं डिजाइन अपने आप में अनूठे हैं। ये साड़ियां देखने में जितनी खूबसूरत लगती हैं उतनी ही सुंदर पहनकर लगती हैं। चंदेरी साड़ी की विशेषता इसके हल्के, महीन बनावट और उत्तम विषयासक्त अनुभव है। पारंपरिक सूती धागे में रेशम और सुनहरी जरी में बुनाई करके चंदेरी वस्त्र का उत्पादन किया जाता है।
चंदेरी का इतिहास
बुंदेलखंड और मालवा की सीमा से लगा ये शहर बुनकरों की नगरी है। चंदेरी का इतिहास बहुत गौरवशाली है जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत काल में भी किया गया है। कहा जाता है कि वैदिक युग में भगवान श्रीकृष्ण की बुआ के पुत्र शिशुपाल ने इसकी खोज की थी। अन्य लिखित प्रमाण 11 वीं शताब्दी में भी मिलते हैं। यह भी कहा जाता है कि चंदेरी साड़ी की परम्परा 13वीं शताब्दी में 1350 के आसपास कोली बुनकरों द्वारा शुरू हुई थी। सत्रहवीं सदी में बड़ौदा, नागपुर और ग्वालियर जिले में बसने वाले बुनकर वहां के राजघरानों की स्त्रियों के लिए चंदेरी साड़ियां बुना करते थे।
Comments (0)