नई दिल्ली: नई एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान की किताब में मध्यकालीन भारत के इतिहास को अलग-अलग राजवंशों, राज्यों और समुदायों के संघर्षों के जरिए समझाने की कोशिश की गई है। किताब में राजपूतों, असम के अहोम साम्राज्य, विजयनगर, मराठों, सिखों और जाटों समेत कई शक्तियों का उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि बाहरी शक्तियों का सामना केवल युद्ध के जरिए ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपराओं और राजनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के माध्यम से भी किया गया। किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान अलग-अलग क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका को भी जगह दी गई है।
दिल्ली सल्तनत के दौर का भी किया गया जिक्र
नई किताब में दिल्ली सल्तनत के दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय शासकों के संघर्ष का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें उन क्षेत्रीय शक्तियों के बारे में बताया गया है, जिन्होंने अपने क्षेत्रों में बाहरी सत्ता के विस्तार का सामना किया। किताब में मध्यकालीन भारत को केवल दिल्ली केंद्रित इतिहास के रूप में पेश करने के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों की भूमिका पर भी चर्चा की गई है। मुगल काल के दौरान भी कई क्षेत्रीय शक्तियों और शासकों के संघर्ष को इसमें शामिल किया गया है। मेवाड़ और महाराणा प्रताप के अकबर के खिलाफ संघर्ष का भी उल्लेख किया गया है। इस तरह किताब में अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक और सैन्य संघर्षों को इतिहास की व्यापक तस्वीर के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। साथ ही क्षेत्रीय शक्तियों के योगदान और उनके प्रतिरोध को भी प्रमुखता दी गई है।
असम के अहोम साम्राज्य को मिली खास जगह
नई किताब में असम के अहोम साम्राज्य को भी विशेष स्थान दिया गया है। इसमें बताया गया है कि अहोम राज्य ने करीब छह सौ वर्षों तक अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखी। अहोम शासकों ने मुगल साम्राज्य के विस्तार का लंबे समय तक सामना किया। इसी संदर्भ में सरायघाट के युद्ध का भी उल्लेख किया गया है, जो असम के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। किताब के जरिए यह बताया गया है कि बाहरी शक्तियों के विस्तार का विरोध केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य समेत कई अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका का भी जिक्र किया गया है। इससे मध्यकालीन भारत के इतिहास में अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों के योगदान को सामने लाने की कोशिश दिखाई देती है।
सिख इतिहास और संघर्ष को भी किया गया शामिल
नई किताब में सिख इतिहास और उनके संघर्षों को भी जगह दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें सिख गुरुओं की शहादत और उस दौर की धार्मिक नीतियों का उल्लेख किया गया है। किताब में सिख समुदाय के सामने आई परिस्थितियों और उनके संघर्षों को मध्यकालीन इतिहास के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में बताया गया है। इसके बाद जाटों के प्रतिरोध का भी जिक्र किया गया है। किताब में जाट विद्रोह के पीछे आर्थिक परेशानियों के साथ-साथ औरंगजेब के शासनकाल की कुछ धार्मिक नीतियों का संदर्भ दिया गया है। इस तरह किताब में अलग-अलग समुदायों के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों से जुड़े संघर्षों को एक साथ समझाने की कोशिश की गई है। इससे मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को भी सामने रखा गया है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास का भी उल्लेख
नई किताब में काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास को भी शामिल किया गया है। इसमें मंदिर के पुनर्निर्माण को टोडरमल और मान सिंह से जोड़े जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने की बात कही गई है। किताब में आगे बताया गया है कि बाद में अहिल्याबाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। इस पूरे संदर्भ के जरिए मंदिर के इतिहास में अलग-अलग समय की घटनाओं को जोड़कर समझाने का प्रयास किया गया है। किताब में धार्मिक स्थलों और उनसे जुड़े ऐतिहासिक बदलावों को भी मध्यकालीन भारत के अध्ययन का हिस्सा बनाया गया है। इससे विद्यार्थियों को उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझने का एक और संदर्भ मिलता है।
चैतन्य महाप्रभु और सूफी परंपरा का भी जिक्र
किताब में चैतन्य महाप्रभु की भक्ति परंपरा का भी उदाहरण दिया गया है। इसमें बताया गया है कि उन्होंने बंगाल में सार्वजनिक संकीर्तन के जरिए भक्ति गतिविधियों को आगे बढ़ाया। किताब में इसे उस समय लगाए गए प्रतिबंधों के संदर्भ में भी समझाया गया है। इसके अलावा सूफी परंपरा का भी उल्लेख किया गया है और इसे इस्लाम की अपेक्षाकृत उदार परंपराओं में से एक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। किताब में सूफी परंपरा के प्रसार और समाज पर उसके प्रभाव की चर्चा की गई है। इस तरह मध्यकालीन भारत के इतिहास में धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलनों को भी शामिल किया गया है। राजवंशों और युद्धों के साथ-साथ भक्ति और सूफी परंपराओं के जरिए उस दौर के सामाजिक बदलावों को समझाने की कोशिश की गई है।