सनी देओल की हालिया फिल्म ‘बटवारा 1947’ को लेकर रिलीज से पहले दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता थी, लेकिन प्रदर्शन के बाद इसे समीक्षकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली और बॉक्स ऑफिस पर भी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। फिल्म की कहानी और कलाकारों के अभिनय को लेकर अलग-अलग राय सामने आईं। इसी बीच अभिनेत्री शबाना आजमी ने फिल्म के कमजोर प्रदर्शन की एक वजह सनी देओल का मुस्लिम किरदार निभाना बताया था। उनका मानना था कि सनी की लंबे समय से बनी ‘एक्शन हीरो’ और राष्ट्रवादी छवि के कारण दर्शकों के एक वर्ग के लिए उन्हें इस भूमिका में स्वीकार करना मुश्किल रहा होगा। उनके इस बयान ने फिल्म की असफलता को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी।
राजकुमार संतोषी ने शबाना की थ्योरी पर उठाए सवाल
फिल्म के निर्देशक राजकुमार संतोषी ने शबाना आजमी की इस व्याख्या से असहमति जताई है। ‘वैरायटी इंडिया’ से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्हें यह तर्क समझ में नहीं आता कि किसी अभिनेता के मुस्लिम किरदार में होने से दर्शक उसे स्वीकार नहीं कर सकते। संतोषी ने भारतीय सिनेमा के इतिहास का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि अमिताभ बच्चन जैसे बड़े सितारे भी मुस्लिम किरदार निभा चुके हैं और दर्शकों ने उन्हें स्वीकार किया है। उनके मुताबिक अभिनेता की पहचान और उसके निभाए किरदार को अलग-अलग नजरिए से देखना चाहिए, क्योंकि सिनेमा में कलाकार को अलग-अलग भूमिकाओं में देखने की परंपरा पुरानी रही है।
अमिताभ बच्चन के उदाहरण से समझाई अपनी बात
संतोषी ने विशेष रूप से अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कुली’ का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने मुस्लिम नायक का किरदार निभाया था। उन्होंने यह भी कहा कि मनमोहन देसाई की कई फिल्मों में मुस्लिम नायक रहे और उस दौर के दर्शकों ने ऐसे किरदारों को सहजता से स्वीकार किया। संतोषी का सवाल था कि क्या आज स्थिति ऐसी हो गई है कि किसी दूसरे समुदाय के किरदार को निभाने वाले अभिनेता को दर्शक स्वीकार ही नहीं कर सकते। उन्होंने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि दर्शक समझदार और शिक्षित हैं तथा उन्हें फिल्मकार की मंशा और कहानी को उसके व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। उनके अनुसार केवल अभिनेता की पिछली छवि के आधार पर किसी भूमिका को अस्वीकार करना सिनेमा की विविधता को सीमित कर सकता है।
हालांकि बदलती सामाजिक सोच को लेकर जताई चिंता
दिलचस्प बात यह है कि संतोषी ने एक ओर शबाना आजमी की दलील को खारिज किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि समाज में सहनशीलता और समावेशिता पहले की तुलना में कम हुई है। उन्होंने अपनी 2001 में आई फिल्म ‘लज्जा’ का उदाहरण देते हुए कहा कि संभव है कि आज के दर्शक उस फिल्म में रामायण से जुड़े हिस्से को उसी तरह स्वीकार न करें, जिस तरह उस समय किया गया था। उनके मुताबिक किसी फिल्म को समझने के लिए केवल उसके दृश्य या किरदार को नहीं, बल्कि फिल्मकार की मंशा और लेखक के संदेश को भी देखना जरूरी है। संतोषी का मानना है कि दर्शकों की बदलती संवेदनशीलता के बीच रचनात्मक स्वतंत्रता और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता भी महत्वपूर्ण है।
संतोषी ने समावेशिता को बताया जरूरी
राजकुमार संतोषी ने धर्म और समाज के संदर्भ में अपनी व्यक्तिगत आस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि वह हिंदू हैं, मंदिर जाते हैं और उनके बेटे का नाम राम है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे किसी दूसरे धर्म के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि हर धर्म की सकारात्मक शिक्षाओं से सीख लेने की जरूरत है और संतों ने हमेशा समानता का संदेश दिया है। संतोषी के अनुसार हिंदू धर्म की मूल भावना में भी समावेशिता को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे किसी को बाहर करने के बजाय सभी को साथ लेकर चलने की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उनकी टिप्पणी फिल्म की बहस को केवल बॉक्स ऑफिस से आगे ले जाकर समाज, कला और धार्मिक पहचान के व्यापक सवालों से जोड़ देती है।
क्या किरदार से ज्यादा जरूरी है अभिनेता की छवि?
‘बटवारा 1947’ को लेकर उठी बहस इस सवाल को भी सामने लाती है कि दर्शक किसी कलाकार को उसकी पुरानी छवि के आधार पर देखते हैं या उसके नए किरदार को स्वतंत्र रूप से स्वीकार करते हैं। सनी देओल लंबे समय से देशभक्ति, एक्शन और मजबूत नायक वाली भूमिकाओं के लिए पहचाने जाते रहे हैं। ऐसे में उनके किसी अलग सामाजिक या धार्मिक पहचान वाले किरदार में दिखाई देने पर चर्चा होना स्वाभाविक है, लेकिन संतोषी का तर्क है कि अभिनेता की कला की कसौटी उसकी भूमिका निभाने की क्षमता होनी चाहिए। उनके मुताबिक भारतीय सिनेमा का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है, जहां बड़े सितारों ने अपनी स्थापित छवि से बिल्कुल अलग भूमिकाएं निभाकर दर्शकों की धारणा बदली है।