न्यूयॉर्क - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम में भारत की विविधता, एकता और आध्यात्मिक परंपरा पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में भारतीय मूल के 5 हजार से अधिक अमेरिकी शामिल हुए। इसके अलावा करीब 30 देशों के लगभग 180 धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।
‘एकता और विविधता भारत के DNA में’
मोहन भागवत ने कहा कि भारत की पहचान ही विविधताओं के बीच एकता से बनी है। लोगों की भाषा, पहनावा, जीवनशैली और पूजा करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इन भिन्नताओं के बावजूद मनुष्य के बीच एक स्वाभाविक जुड़ाव मौजूद है। उन्होंने कहा कि इंसानियत किसी भी धार्मिक पहचान से बड़ी है। अलग-अलग लोग और परंपराएं भले ही अलग रास्तों पर चलती हों, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य एक ही सत्य की ओर बढ़ना हो सकता है।
दुनिया को ‘विविधता में एकता’ का संदेश देने की जिम्मेदारी
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को सबसे पहले खुद अपनी विविधता में मौजूद एकता को समझना और अनुभव करना होगा। इसके बाद वह दुनिया के सामने भी इस विचार को मजबूती से रख सकता है। उन्होंने भारत की भूमिका को केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं बताया, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर मानवता और आपसी सद्भाव का संदेश देने से भी जोड़ा।
आध्यात्मिक विकास को बताया जरूरी
मोहन भागवत ने मानव जीवन में आध्यात्मिक विकास के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इंसान को सोचने और समझने की क्षमता मिली है और यही उसे अन्य जीवों से अलग बनाती है। हालांकि, व्यक्ति अपनी सोच को किस दिशा में ले जाता है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सकारात्मक और सही दिशा में सोचने से व्यक्ति ईश्वर और बेहतर जीवन मूल्यों की ओर बढ़ता है, जबकि गलत सोच उसे नकारात्मकता और पशुता की ओर ले जा सकती है।
समाज में दो तरह की प्रवृत्तियों का जिक्र
कार्यक्रम में मोहन भागवत ने समाज में मौजूद दो अलग-अलग मानसिकताओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार एक सोच ‘जियो और जीने दो’ की है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के अस्तित्व और विचारों का सम्मान करता है। वहीं दूसरी प्रवृत्ति ऐसी है जिसमें व्यक्ति केवल उन्हीं लोगों को स्वीकार करना चाहता है जो उसकी सोच और विचारों के अनुरूप हों। उन्होंने दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर बताते हुए सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों के महत्व पर जोर दिया।
वैश्विक मंच पर भारत की विचारधारा
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित इस कार्यक्रम में अलग-अलग देशों और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोगों की मौजूदगी रही। अपने संबोधन में भागवत ने भारत की सांस्कृतिक सोच को वैश्विक संदर्भ से जोड़ते हुए विविधता के सम्मान, मानवता और आध्यात्मिक उन्नति को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पहचान और परंपराओं के बावजूद मनुष्यों के बीच जुड़ाव को समझना ही व्यापक एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।