पश्चिम बंगाल में नीम के पेड़ों पर इस समय एक खतरनाक बीमारी फैल रही है, जो उन्हें तेजी से नष्ट कर रही है। यह एक गंभीर फफूंद जनित रोग है, जिसे “डाइबैक” या “ट्विग ब्लाइट” कहा जाता है।इस बीमारी का मुख्य कारण एक खतरनाक फफूंद है, जिसका नाम “फोमोप्सिस अजादिरख्ता” है। यह फफूंद उन पेड़ों पर हमला कर रही है जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर हो चुके हैं। अत्यधिक गर्मी, लंबे समय तक सूखा और जमीन में पानी का स्तर गिरना इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं।
नीम के पेड़ों के साथ क्या हो रहा है?
इस बीमारी में पेड़ों की ऊपरी पत्तियां पीली पड़कर झड़ने लगती हैं। पत्तियां मुरझा जाती हैं और तनों व शाखाओं पर काले धंसे हुए धब्बे बन जाते हैं। इसके बाद लकड़ी भूरी पड़ने लगती है और पेड़ तेजी से सड़ने लगता है। यह बीमारी अब कोलकाता, सॉल्ट लेक और बोलपुर सहित बीरभूम जिले के कई हिस्सों में देखी जा रही है। पहले यह समस्या दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में भी देखी गई थी।
यह स्थिति इतनी चिंताजनक क्यों है?
नीम का पेड़ “गांव की दवा” या “चमत्कारी पेड़” माना जाता है, क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से बैक्टीरिया और फफूंद से लड़ने की क्षमता होती है। ऐसे पेड़ का खुद फफूंद से नष्ट होना बहुत गंभीर बात है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जलवायु परिवर्तन का सीधा असर है। लगातार बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम ने पेड़ों को कमजोर बना दिया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह खतरा सिर्फ नीम तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में अन्य पेड़ों पर भी इसका असर पड़ सकता है। इससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को नुकसान हो रहा है। इस बीमारी के कारण नीम के फलों का लगभग पूरा उत्पादन खत्म हो सकता है, जिससे प्राकृतिक कीटनाशक बनाने पर असर पड़ेगा।
आगे क्या किया जा रहा है?
पश्चिम बंगाल में अधिकारी और पर्यावरण विशेषज्ञ इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं। संक्रमित पेड़ों का इलाज फफूंदनाशक दवाओं से किया जा रहा है, जिससे कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। बीमारी को फैलने से रोकने के लिए प्रभावित शाखाओं को काटना और इस्तेमाल किए जाने वाले औजारों को साफ रखना बहुत जरूरी है। यह बीमारी बीज, हवा और बारिश के जरिए भी फैल सकती है। कुछ अन्य पेड़ जैसे शिरीष में भी इसी तरह की परेशानी देखी जा रही है, जो इस बात का संकेत है कि यह एक बड़ा पर्यावरणीय संकट बन सकता है।