मध्य पूर्व में हालिया हिंसा और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या के बाद भू-राजनीतिक माहौल अस्थिर हो गया है। इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ा है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत की सामरिक परीक्षा बन चुकी है।
90 लाख भारतीयों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता
खाड़ी क्षेत्र भारत के प्रवासी समुदाय का सबसे बड़ा केंद्र है। लगभग 90 लाख भारतीय वहां काम करते हैं, पढ़ते हैं या विभिन्न सेवाओं में कार्यरत हैं। इतनी बड़ी आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत को ऐसे किसी कदम से बचना होगा, जिससे खाड़ी क्षेत्र में भारतीयों के हित प्रभावित हों।
ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
मध्य पूर्व में संघर्ष के बढ़ते रहने का सबसे सीधा असर ऊर्जा बाज़ार पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं और इसके और बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। डॉ. कमर के अनुसार भारत अपनी ज़रूरत का लगभग आधा कच्चा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। यदि युद्ध लंबा चला या हालात और बिगड़े, तो भारत का आयात बिल तेज़ी से बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
ईरान और इजरायल के बीच संतुलन बनाए रखने की कूटनीतिक चुनौती
भारत के संबंध ईरान और इजरायल दोनों के साथ महत्वपूर्ण और संवेदनशील हैं। इजरायल भारत का प्रमुख रक्षा सहयोगी है, जबकि ईरान भारत की क्षेत्रीय संपर्क योजनाओं और ऊर्जा मार्गों के लिए अहम है। मौजूदा माहौल में भारत को संतुलित कूटनीति अपनानी होगी ताकि दोनों देशों के साथ रिश्तों में कोई दरार न आए। डॉ. कमर ने कहा कि भारत न तो ईरान से दूरी बना सकता है और न ही इजरायल को नज़रअंदाज़ कर सकता है।
क्या होगा भारत का अगला कदम?
बदलते हालात में भारत को कई स्तरों पर रणनीति बनानी होगी—प्रवासियों की सुरक्षा, ऊर्जा आयात की स्थिरता, और मध्य पूर्व में अपने भू-राजनीतिक हितों की रक्षा। यह संकट जितना बड़ा दिख रहा है, उतनी ही सावधानी और दूरदृष्टि के साथ भारत को अपने कदम रखने होंगे।
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