अफ्रीका महाद्वीप के नीचे इस समय एक बड़ी भूगर्भीय प्रक्रिया सक्रिय है, जो इसे धीरे-धीरे दो हिस्सों में विभाजित कर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्वी अफ्रीका क्षेत्र में धरती की पपड़ी यानी क्रस्ट असामान्य रूप से पतली हो रही है, जो महाद्वीप के टूटने की दिशा में बढ़ते संकेत देती है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है।
पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट प्रणाली का विस्तार
यह दरार पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट प्रणाली का हिस्सा है, जो इथियोपिया के अफार क्षेत्र से लेकर मोजाम्बिक तक फैली हुई है। तुर्काना रिफ्ट, जो केन्या और इथियोपिया के बीच लगभग 500 किलोमीटर तक फैला है, इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां अफ्रीकी और सोमाली प्लेटें धीरे-धीरे एक-दूसरे से अलग हो रही हैं।
प्लेटों का अलगाव और बढ़ता तनाव
वैज्ञानिकों के अनुसार, ये प्लेटें हर वर्ष लगभग 4.7 मिलीमीटर की दर से दूर जा रही हैं। इस धीमी लेकिन निरंतर गति से धरती की सतह पर तनाव उत्पन्न होता है, जिससे जमीन में दरारें पड़ने लगती हैं। हालांकि सभी दरारें महाद्वीप को नहीं तोड़तीं, लेकिन इस क्षेत्र में यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
क्रस्ट का पतलापन और ‘नेकिंग’ प्रक्रिया
शोध में पाया गया है कि दरार के केंद्र में क्रस्ट की मोटाई केवल 13 किलोमीटर रह गई है, जबकि आसपास के क्षेत्रों में यह 35 किलोमीटर से अधिक है। यह अंतर ‘नेकिंग’ नामक प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसमें धरती की पपड़ी खिंचकर पतली होती जाती है। इस स्थिति को महाद्वीप के विभाजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
वैज्ञानिकों के लिए बढ़ती चुनौती
इस अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया पहले के अनुमान से कहीं अधिक आगे बढ़ चुकी है। इससे वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि यह संकेत देता है कि भूगर्भीय परिवर्तन अपेक्षा से अधिक तेजी से हो सकते हैं। हालांकि यह बदलाव मानव समय-सीमा की तुलना में बहुत धीमे होते हैं, फिर भी इनके दीर्घकालिक प्रभाव व्यापक हो सकते हैं।
भविष्य में बन सकता है नया महासागर
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह दरार आने वाले लाखों वर्षों में एक नए महासागर के निर्माण का कारण बन सकती है। इस प्रक्रिया को ओशनाइजेशन कहा जाता है, जिसमें धरती की दरारों से मैग्मा ऊपर उठता है और नई समुद्री सतह का निर्माण करता है। अंततः हिंद महासागर का पानी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है, जिससे एक नया समुद्री क्षेत्र अस्तित्व में आ सकता है।
प्रकृति के लंबे चक्र की झलक
यह पूरी प्रक्रिया लाखों वर्षों में घटित होती है और यह दर्शाती है कि पृथ्वी लगातार बदल रही है। अफ्रीका महाद्वीप का यह संभावित विभाजन प्रकृति के दीर्घकालिक भूगर्भीय चक्र का हिस्सा है, जो भविष्य में पृथ्वी के भूगोल को पूरी तरह बदल सकता है।