साल 2020 की गलवान घाटी झड़प भारत और चीन के इतिहास में सबसे तनावपूर्ण क्षणों में दर्ज है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने थीं और वैश्विक स्तर पर हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के अंडर सेक्रेट्री ऑफ स्टेट थॉमस डिनानो का यह दावा कि झड़प के सात दिन बाद चीन ने परमाणु परीक्षण किया, नई राजनीतिक बहस की शुरुआत कर रहा है। डिनानो का कहना है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास चीन द्वारा ग्लोबल मॉनिटरिंग से बचते हुए किए गए गुप्त परीक्षण के पुख्ता संकेत मौजूद हैं। यह दावा उस समय से जोड़कर देखा जा रहा है जब चीन की गतिविधियाँ भारत के लिए रणनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई थीं।
अमेरिका की चुप्पी और छह साल बाद का खुलासा
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि अमेरिका के पास 2020 में यह खुफिया जानकारी मौजूद थी, तो उसने अचानक 2026 में ही इसे सार्वजनिक क्यों किया? विश्लेषकों का मानना है कि यह खुलासा ऐसे समय आया है जब भारत–चीन संबंध सामान्य होने की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह भी संभव है कि अमेरिका चीन की परमाणु नीतियों पर वैश्विक संदेह बढ़ाना चाहता हो या एशिया में शक्ति संतुलन के मुद्दों पर नई बहस छेड़ना चाहता हो। अमेरिका की यह रणनीतिक चुप्पी और फिर अचानक मुखर होना इस बात का संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समय और सन्देश दोनों की अपनी गणना होती है।
चीन की ‘डिकपलिंग’ तकनीक और परीक्षण का रहस्य
डिनानो का दावा है कि चीन ने परीक्षण के दौरान ‘डिकपलिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसके चलते भूकंपीय संकेतों का पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। इस तकनीक के तहत जमीन में एक बड़े गड्ढे के भीतर ब्लास्ट किया जाता है, जिससे भूकंपीय तरंगें काफी हद तक दब जाती हैं। लोप नुर का यह इलाका पहले भी चीन के परमाणु परीक्षणों के लिए चर्चित रहा है। इस तकनीक का उपयोग यह संकेत देता है कि चीन अपने परीक्षणों को वैश्विक निगरानी से छिपाने की क्षमता विकसित कर चुका है, जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से और भी चिंताजनक है।
भारत–चीन समीकरण और खुलासे का प्रभाव
भारत और चीन के बीच बीते महीनों में संबंधों के सुधार की दिशा में कुछ पहलें दिखाई दी हैं। सीमा विवादों को बातचीत से सुलझाने के प्रयास भी जारी हैं। ऐसे समय में अमेरिका का यह बयान दोनों देशों के द्विपक्षीय संवाद पर असर डाल सकता है। भारत के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वह अमेरिका की मंशा और चीन की रणनीति दोनों को संतुलित तरीके से समझे। गलवान के बाद चीन की गतिविधियाँ निश्चित ही भारत के लिए संवेदनशील रही हैं, लेकिन वर्तमान में बदलते समीकरण नई कूटनीतिक सतर्कता की मांग करते हैं।
वैश्विक राजनीति में संदेश और भविष्य की दिशा
अमेरिका का यह दावा केवल एक खुफिया सूचना का खुलासा भर नहीं है, बल्कि इसके गहरे कूटनीतिक मायने हैं। यह वैश्विक महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, एशिया में बदलते शक्ति-संतुलन और चीन की आक्रामक रणनीतिक नीतियों की ओर इशारा करता है। आने वाले समय में यह खुलासा परमाणु अप्रसार, तकनीकी निगरानी और एशियाई सुरक्षा ढांचे पर नई बहस को जन्म दे सकता है। भारत के लिए यह परिस्थिति अपनी सामरिक तैयारी और कूटनीतिक नीति दोनों में संतुलन और सतर्कता बनाए रखने का संकेत भी देती है।
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