इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेल अवीव पहुंचने से ठीक पहले एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल विजन दुनिया के सामने रखा। इसे उन्होंने ‘हेक्सागन’ नाम दिया है, जिसका अर्थ है छह कोनों वाला सुरक्षा गठजोड़। नेतन्याहू का कहना है कि वह मध्य-पूर्व और उसके आसपास विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ते हुए एक ऐसा सुरक्षा ढांचा बनाना चाहते हैं जिसमें भारत, अरब जगत, अफ्रीकी देश, ग्रीस और साइप्रस जैसे भूमध्यसागरीय देश तथा एशिया के कुछ अन्य राष्ट्र शामिल होंगे। नक्शे पर यह वही भूभाग है, जिस पर इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर आधारित था।
सुरक्षा, व्यापार और ‘रेडिकल’ खतरे—नेतन्याहू की मंशा क्या है
हालांकि यह गठबंधन सिर्फ आर्थिक साझेदारी तक सीमित नहीं है। नेतन्याहू खुले शब्दों में कह रहे हैं कि ‘हेक्सागन’ उन रेडिकल ताकतों के खिलाफ होगा जो क्षेत्र को अस्थिर कर रही हैं। उनका संकेत ईरान और उससे जुड़े प्रॉक्सी गुटों की ओर है। इजरायल की चिंता साफ है कि शिया और सुन्नी दोनों धड़ों में मौजूद कट्टरपंथी संगठन उसके लिए स्थायी खतरा बन रहे हैं। ऐसे में वह एक ऐसी सुरक्षा दीवार चाहता है जो राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक मोर्चों पर उसका साथ दे सके।
भारत को ‘एंकर’ बनाने की नेतन्याहू की इच्छा
नेतन्याहू भारत को इस गठजोड़ का ‘एंकर’ यानी केंद्रीय स्तंभ मानते हैं। उनके अनुसार भारत अब एक वैश्विक शक्ति बन चुका है और उसकी भागीदारी इस गठबंधन को मजबूत आधार देगी। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को ‘पर्सनल फ्रेंड’ कहा है, पर विशेषज्ञों का मानना है कि मामला इससे कहीं आगे है। किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर एंड्रियास क्रेग के शब्दों में, इजरायल खुद को भू-राजनीतिक रूप से घिरा हुआ महसूस कर रहा है और उसे लगता है कि भारत जैसी शक्ति खुलकर साथ खड़ी होती है, तो संदेश ईरान, तुर्किये जैसे देशों तक जाएगा कि इजरायल अकेला नहीं है।
भारत के लिए चुनौती और कूटनीतिक धर्मसंकट
लेकिन इस समीकरण का दूसरा पहलू भारत के लिए उतना सरल नहीं है। भारत की विदेश नीति संतुलन की नीति रही है—हम इजरायल से उतने ही अच्छे संबंध रखते हैं जितने ईरान से। सऊदी अरब और यूएई के साथ हमारी रणनीतिक साझेदारी बढ़ रही है। रूस और अमेरिका दोनों से हमारे रिश्ते मज़बूत लेकिन स्वतंत्र हैं। ऐसे में किसी सुरक्षा गठबंधन में शामिल होना भारत को एक धड़े में बांध सकता है, जिससे क्षेत्रीय ध्रुवीकरण बढ़ेगा और भारत को कई मोर्चों पर अनचाही राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
हेक्सागन में शामिल होने के संभावित जोखिम
अगर भारत ‘हेक्सागन’ का हिस्सा बनता है, तो इजरायल के विरोधी इसे एक नए धड़े का गठन मान सकते हैं। इससे भारत को पश्चिम एशिया में अपने दीर्घकालिक हितों—ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, भारतीय प्रवासी सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों—पर जोखिम झेलना पड़ सकता है। यह भी आशंका है कि इससे भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति पर सवाल उठेंगे, जो वर्षों से उसकी कूटनीति की मूल आधारशिला रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि उसकी स्वतंत्र विदेश नीति पर कोई दबाव न आए।
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