गाजा युद्ध के बाद वैश्विक संघर्षों के समाधान को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय खुलता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ अब वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है। इस पहल को इजराइल का समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि पारंपरिक बहुपक्षीय मंचों से इतर नए ढांचे उभर रहे हैं।
इजराइल की सहमति और रणनीतिक संकेत
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा की है कि इजराइल ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के लिए सहमत हो गया है। नेतन्याहू के कार्यालय के अनुसार, इजराइल इस मंच के साथ सहयोग करेगा। हालांकि, इससे पहले इजराइल ने गाजा से जुड़े बोर्ड के कार्यकारी ढांचे पर आपत्तियां जताई थीं और कहा था कि उसकी संरचना इजराइली हितों के अनुरूप नहीं है। इसके बावजूद सहमति यह दर्शाती है कि इजराइल इस मंच को प्रभावी मान रहा है।
गाजा के बाद शांति प्रक्रिया की नई राह
गाजा युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने शांति स्थापना की सीमाओं को उजागर किया है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को गाजा के बाद के दौर में संघर्ष समाधान के लिए एक वैकल्पिक मंच के रूप में देखा जा रहा है। समर्थकों का मानना है कि यह पहल तेज निर्णय, सीमित सदस्यता और प्रत्यक्ष राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण अधिक प्रभावी साबित हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र पर ट्रंप का तीखा हमला
अपने दूसरे कार्यकाल की पहली वर्षगांठ पर आयोजित लंबी प्रेसवार्ता में डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र कभी भी अपनी पूरी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पाया। ट्रंप के अनुसार, यदि संयुक्त राष्ट्र प्रभावी होता, तो गाजा के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी पहल की जरूरत ही नहीं पड़ती।
क्या UN की जगह ले सकता है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ‘बोर्ड ऑफ पीस’ भविष्य में संयुक्त राष्ट्र का स्थान ले सकता है, तो उन्होंने इसे संभव बताया। ट्रंप ने दावा किया कि अपने दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष में उन्होंने भारत–पाकिस्तान, कोसोवो–सर्बिया और कांगो–रवांडा जैसे आठ बड़े संघर्षों को सुलझाया, जिनमें संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं रही। यह बयान वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर गंभीर बहस को जन्म देता है।
वैश्विक व्यवस्था पर दूरगामी असर
इजराइल की भागीदारी और ट्रंप के आक्रामक रुख से यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है। बहुपक्षीयता बनाम वैकल्पिक मंचों की यह बहस आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति की दिशा तय कर सकती है। यदि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ठोस नतीजे देता है, तो संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर दबाव और बढ़ सकता है।
नई पहल, नई चुनौतिया
‘बोर्ड ऑफ पीस’ का उभार वैश्विक शांति प्रयासों में प्रयोगधर्मिता को दर्शाता है। इजराइल का समर्थन इसे वैधता देता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह जमीनी स्तर पर कितने प्रभावी समाधान दे पाता है। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है कि बदलती दुनिया में उसकी भूमिका कैसे प्रासंगिक बनी रहे।
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