कोलकाता डेस्क: दिनभर स्कूल में पढ़ाई, अनुशासन, होमवर्क, शिक्षकों और दोस्तों के बीच रहने के बाद बच्चा जब घर लौटता है, तो वह शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी थका हुआ हो सकता है। ऐसे में माता-पिता का प्यार और चिंता स्वाभाविक है, लेकिन घर आते ही लगातार सवाल पूछना बच्चे को असहज कर सकता है। कई बार बच्चे को कुछ समय अकेले या आराम से बिताने की जरूरत होती है। अगर माता-पिता बिना उसकी स्थिति समझे सवालों की झड़ी लगा दें, तो बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है। इससे वह अपनी बातें साझा करने से भी बचने लगता है। इसलिए जरूरी है कि बच्चे से बातचीत करने का तरीका थोड़ा बदला जाए। आइए जानते हैं स्कूल से आते ही किन सवालों से बचना चाहिए और बातचीत की शुरुआत कैसे करनी चाहिए।
स्कूल से आते ही न पूछें ये 5 सवाल
1. आज पढ़ाई कैसी रही?
स्कूल से आते ही बच्चे से यह पूछना कि ‘आज पढ़ाई कैसी रही?’ सुनने में सामान्य लगता है। लेकिन दिनभर पढ़ाई करने के बाद दोबारा पढ़ाई से जुड़ा सवाल बच्चे को थोड़ा बोझिल महसूस करा सकता है। बच्चा इस सवाल का जवाब अक्सर सिर्फ ‘अच्छी रही’ या ‘ठीक थी’ कहकर खत्म कर देता है। इससे माता-पिता और बच्चे के बीच बातचीत आगे बढ़ने की संभावना कम हो जाती है। अगर बच्चा थका हुआ है, तो उसे पहले कुछ समय आराम करने देना बेहतर हो सकता है। उसके बाद आप उसकी पसंद की किसी सामान्य बात से बातचीत शुरू कर सकते हैं। मसलन, उसके दोस्तों, स्कूल की किसी मजेदार घटना या दिन के किसी अच्छे अनुभव के बारे में बात की जा सकती है। इस तरह बातचीत पूछताछ जैसी न लगकर सहज और दोस्ताना महसूस होगी।
2. क्या आज मैम ने तुम्हें डांटा?
बच्चे से रोज स्कूल लौटते ही यह पूछना कि ‘क्या आज मैम ने तुम्हें डांटा?’ सही तरीका नहीं माना जाता। इस तरह का सवाल बच्चे को यह महसूस करा सकता है कि माता-पिता उसकी गलतियों को लेकर पहले से चिंतित हैं। उसे लग सकता है कि घर पर आने के बाद भी उससे स्कूल की शिकायतों के बारे में ही पूछा जाएगा। अगर बच्चा किसी छोटी गलती के बारे में बताना चाहता भी हो, तो वह बात छिपाने की कोशिश कर सकता है। बार-बार ऐसे सवाल पूछने से बच्चे और माता-पिता के बीच खुलकर बातचीत प्रभावित हो सकती है।इसके बजाय माता-पिता सामान्य तरीके से पूछ सकते हैं कि आज स्कूल में क्या अच्छा लगा। अगर बच्चे के साथ कोई परेशानी हुई होगी, तो सहज माहौल मिलने पर वह खुद भी उसके बारे में बता सकता है। इससे बच्चे को यह भरोसा मिलता है कि उसकी बात पहले सुनी जाएगी और बाद में समझाई जाएगी।
3. आज टिफिन पूरा क्यों नहीं खाया?
स्कूल से घर आते ही बच्चे का टिफिन देखकर यह पूछना कि उसने खाना पूरा क्यों नहीं खाया, उसे परेशान कर सकता है। कई बार बच्चा टिफिन पूरा नहीं खा पाता क्योंकि लंच ब्रेक कम होता है या उस समय उसे भूख नहीं लगती। कभी-कभी खाने का स्वाद, दोस्तों के साथ बातचीत या स्कूल की किसी दूसरी गतिविधि की वजह से भी खाना बच सकता है। ऐसे में तुरंत डांटने या सवाल करने से बच्चे का मूड खराब हो सकता है। अगर यह रोज हो रहा है, तो माता-पिता बाद में आराम से बच्चे से इसकी वजह पूछ सकते हैं। बच्चे की पसंद और स्कूल के समय को ध्यान में रखकर टिफिन में बदलाव भी किया जा सकता है। खाने को लेकर लगातार दबाव बनाने के बजाय बच्चे को भोजन के महत्व के बारे में प्यार से समझाना बेहतर है। इससे बच्चे के मन में खाने को लेकर डर या तनाव पैदा होने की संभावना भी कम रहेगी।
4. आज टेस्ट में कितने नंबर आए?
स्कूल से लौटते ही बच्चे से उसके टेस्ट के नंबर पूछना कई बार उसके लिए तनाव का कारण बन सकता है। उसे ऐसा लग सकता है कि माता-पिता उसकी मेहनत और भावनाओं से ज्यादा उसके नंबरों को महत्व देते हैं। अगर उसके अंक उम्मीद से कम आए हैं, तो वह डर के कारण सच बताने से भी बच सकता है। माता-पिता को केवल परिणाम पर ध्यान देने के बजाय बच्चे की तैयारी और मेहनत के बारे में बात करनी चाहिए। उसे यह समझाना जरूरी है कि एक टेस्ट के नंबर उसकी पूरी क्षमता तय नहीं करते। अगर कहीं कमी रह गई है, तो बच्चे के साथ बैठकर शांत तरीके से उस विषय पर चर्चा की जा सकती है। इससे बच्चा परीक्षा को लेकर ज्यादा सकारात्मक नजरिया विकसित कर सकता है और अपनी परेशानियां खुलकर बता सकता है।
5. तुम दिनभर क्या करते रहते हो, कुछ सीखते भी हो?
यह सवाल बच्चे के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है, खासकर अगर इसे गुस्से या ताने के रूप में कहा जाए। बच्चे को लग सकता है कि उसके प्रयासों को माता-पिता महत्व नहीं दे रहे हैं। स्कूल, पढ़ाई, दोस्तों और दूसरी गतिविधियों में दिन बिताने के बाद उसे यह सवाल आलोचना जैसा महसूस हो सकता है। बार-बार ऐसा सुनने पर बच्चा अपनी उपलब्धियों या परेशानियों के बारे में बात करना कम कर सकता है। माता-पिता को बच्चे की छोटी-छोटी कोशिशों को भी पहचानने और उसकी सराहना करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर बच्चा किसी काम में पीछे है, तो उसे ताना देने के बजाय उस काम को बेहतर तरीके से करने में मदद करनी चाहिए। बातचीत का उद्देश्य बच्चे को डराना नहीं, बल्कि उसे अपनी बात कहने के लिए सुरक्षित माहौल देना होना चाहिए। प्यार और प्रोत्साहन के साथ की गई बातचीत बच्चे के आत्मविश्वास को मजबूत करने में मदद कर सकती है।
बच्चे से बातचीत का तरीका बदलकर देखें
बच्चा जब स्कूल से घर लौटे तो सबसे पहले उसे थोड़ा आराम करने का मौका दें। घर आते ही सवालों की बौछार करने के बजाय प्यार से उसका स्वागत करें और पानी या हल्का नाश्ता दें। अगर बच्चा थका हुआ है, तो कुछ देर उसे अपनी पसंद का काम करने या आराम करने दें। जब वह सहज महसूस करने लगे, तब बातचीत की शुरुआत सामान्य और सकारात्मक तरीके से करें। सीधे सवाल पूछने के बजाय माता-पिता अपने दिन की कोई छोटी-सी बात बच्चे के साथ साझा कर सकते हैं। जैसे, ‘आज मेरा दिन अच्छा रहा, तुम्हारा दिन कैसा रहा?’ कहकर बातचीत को सहज बनाया जा सकता है। जब माता-पिता खुद अपनी बातें साझा करते हैं, तो बच्चे को भी अपनी बात कहने में कम झिझक महसूस हो सकती है। धीरे-धीरे यह तरीका बच्चे और माता-पिता के बीच भरोसे और अपनापन बढ़ाने में मदद कर सकता है।
बच्चे की बात ध्यान से सुनने की आदत डालें
बच्चा जब अपनी कोई बात बताना शुरू करे, तो माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि उसकी बात बीच में न काटें। तुरंत सलाह देने या डांटने के बजाय पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा क्या महसूस कर रहा है। अगर स्कूल में उससे कोई गलती हुई है, तो पहले उसकी पूरी बात शांत होकर सुनी जा सकती है। इसके बाद माता-पिता उसे प्यार से समझा सकते हैं कि उस स्थिति को बेहतर तरीके से कैसे संभाला जा सकता था। बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि घर ऐसी जगह है जहां वह अपनी परेशानी बिना डर के बता सकता है। जब बच्चे को लगेगा कि उसकी बात सुनी और समझी जाती है, तो वह छोटी-बड़ी बातें माता-पिता के साथ साझा करने में ज्यादा सहज होगा। इस तरह बातचीत सिर्फ सवाल-जवाब तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रिश्ते में भरोसा और दोस्ती भी बढ़ेगी। माता-पिता का यह छोटा सा बदलाव बच्चे के साथ मजबूत और प्यार भरा रिश्ता बनाने में मदद कर सकता है।