मुंबई. बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिससे सेवाएं अधिक आसान और सुलभ बन रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे ने हाल ही में कहा कि एआई आधारित तकनीकों के माध्यम से ग्राहकों से संवाद करना और सेवाएं प्रदान करना पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल हो जाएगा। इससे ग्राहकों को जटिल प्रक्रियाओं और फॉर्म भरने की आवश्यकता कम होगी, और भाषा की बाधा भी काफी हद तक समाप्त हो सकेगी।
लोन प्रक्रिया और शिकायत निपटान में आएगी तेजी
एआई के इस्तेमाल से बैंकिंग सेवाओं में गति और पारदर्शिता दोनों बढ़ने की संभावना है। ग्राहकों की शिकायतों का निपटारा तेजी से किया जा सकेगा और लोन प्राप्त करने की प्रक्रिया भी अधिक सहज हो जाएगी। खास बात यह है कि जिन लोगों का पारंपरिक क्रेडिट स्कोर नहीं है, उनके लेन-देन और व्यापारिक गतिविधियों का विश्लेषण करके उन्हें भी ऋण उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके अलावा बैंकिंग धोखाधड़ी की पहचान और रोकथाम में भी एआई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
एक गलती से बदल सकती है पूरी आर्थिक स्थिति
हालांकि एआई के लाभ जितने बड़े हैं, जोखिम भी उतने ही गंभीर हैं। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि एआई द्वारा लिया गया एक गलत निर्णय किसी व्यक्ति की पूरी आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यदि डेटा में त्रुटि या छेड़छाड़ होती है, तो एआई का निर्णय भी गलत हो सकता है, जिसके कारण किसी ग्राहक को लोन से वंचित किया जा सकता है या उसके खाते पर गलत कार्रवाई हो सकती है। इस प्रकार की स्थिति केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि गंभीर वित्तीय चुनौती बन सकती है।
डाटा की गुणवत्ता और सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती
एआई पूरी तरह से डेटा पर आधारित होता है, और यह डेटा किसी व्यक्ति के पिछले वित्तीय व्यवहार और लेन-देन से तैयार होता है। यदि इस डेटा में किसी प्रकार की कमी या गड़बड़ी होती है, तो उसका सीधा असर एआई के निर्णय पर पड़ता है। वित्तीय डेटा अत्यंत संवेदनशील होता है और इसमें किसी भी प्रकार की चूक ग्राहकों के भरोसे को कमजोर कर सकती है। इसके अलावा एआई के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ गया है, जो बैंकिंग प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वित्तीय समावेश और ग्राहक सुरक्षा पर उठे सवाल
एआई के व्यापक उपयोग ने वित्तीय समावेश और ग्राहक सुरक्षा को लेकर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पहले जहां एक गलत निर्णय सीमित लोगों को प्रभावित करता था, वहीं अब एक ही एआई मॉडल को कई संस्थाएं अपनाने से लाखों ग्राहक प्रभावित हो सकते हैं। इस कारण यह आवश्यक हो गया है कि एआई के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की त्रुटि का दायरा सीमित रखा जा सके।
मानवीय जवाबदेही को रखा गया सर्वोपरि
आरबीआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि एआई के इस युग में भी अंतिम जिम्मेदारी मानव और संस्थाओं की ही होगी। एआई केवल निर्णय लेने में सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन उसके आधार पर लिए गए फैसलों की जवाबदेही अधिकारियों को ही उठानी होगी। साथ ही यह भी आवश्यक है कि ऐसे एआई मॉडल विकसित किए जाएं जो समाज के उन वर्गों को भी वित्तीय सेवाओं से जोड़ सकें, जो अब तक इससे वंचित रहे हैं।