लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में नून-कुन की चोटियों के पास एक घायल पर्वतारोही को बचाने के लिए भारतीय सेना के एविएशन कोर ने ऐसा अभियान चलाया, जिसमें जरा सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती थी। शनिवार को 2 पायलटों ने एकल इंजन वाले चीतल हेलिकॉप्टर को करीब 18,600 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर बर्फ से ढकी बेहद खतरनाक ढलान पर उतारा। अधिकारियों के मुताबिक वहां सामान्य तरीके से हेलिकॉप्टर उतारने के लिए पर्याप्त जगह मौजूद नहीं थी और तेज हवाएं चुनौती को और बढ़ा रही थीं। इसके बावजूद पायलटों ने बेहद सटीक नियंत्रण के साथ हेलिकॉप्टर को ढलान के किनारे पहुंचाया और केवल 1 स्किड के सहारे लैंडिंग पूरी की। इस साहसिक अभियान ने एक बार फिर दिखाया कि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में भारतीय सेना की हवाई बचाव क्षमता कितनी महत्वपूर्ण है।
तेज हवाओं और बर्फीली ढलान के बीच चला अभियान
यह अभियान उस समय किया गया जब मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां दोनों बेहद कठिन थीं। नून-कुन क्षेत्र की ऊंचाई पर हवा का तेज दबाव, बर्फीली सतह और सीमित दृश्यता हेलिकॉप्टर संचालन को अत्यंत जोखिमपूर्ण बना सकती है। अधिकारियों के अनुसार घायल जूनियर कमीशंड अधिकारी को निकालने के लिए उपलब्ध अंतिम लैंडिंग विंडो का इस्तेमाल किया गया। मिशन को संभव बनाने के लिए हेलिकॉप्टर से गैर-जरूरी उपकरण हटाए गए और ईंधन की मात्रा भी सीमित रखी गई, ताकि उसका भार कम किया जा सके। इसके बाद पायलटों ने बेहद सावधानी से हेलिकॉप्टर को ऐसी जगह पहुंचाया, जहां उतरने की सामान्य गुंजाइश नहीं थी। एक स्किड के ढलान को छूने के दौरान घायल सैनिक को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया पूरी की गई।
पायलटों ने दिखाई असाधारण सूझबूझ और हिम्मत
सेना के कोर मुख्यालय की ओर से बताया गया कि पायलटों ने बेहद चुनौतीपूर्ण ढलान पर मजबूत हवाओं के बीच अभियान को अंजाम दिया। सामान्य लैंडिंग स्थान उपलब्ध नहीं होने के कारण हेलिकॉप्टर को नियंत्रित रखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। मिशन के दौरान वजन कम करने और सीमित ईंधन के साथ उड़ान भरने जैसे फैसले भी अभियान की सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहे। पायलटों ने परिस्थितियों का लगातार आकलन करते हुए हेलिकॉप्टर को उस बिंदु तक पहुंचाया, जहां से घायल व्यक्ति को निकाला जा सके। सेना ने इस कार्रवाई को असाधारण सटीकता, साहस और दृढ़ संकल्प का उदाहरण बताया है। इस तरह के अभियानों में पायलटों की तकनीकी दक्षता के साथ-साथ तत्काल निर्णय लेने की क्षमता भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
बचाव के बाद भी नहीं बच सकी घायल सैनिक की जान
सेना के अधिकारियों के मुताबिक घायल जेसीओ को बेहद कठिन परिस्थितियों से निकालकर चिकित्सा सहायता के लिए पहुंचाया गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्होंने दम तोड़ दिया। उन्हें कारगिल स्थित सेना के अस्पताल ले जाया गया था, जहां उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने उस चुनौती को भी सामने ला दिया है, जिसका सामना ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैन्यकर्मियों को करना पड़ता है। कई बार समय पर चिकित्सा सहायता तक पहुंचना भी मौसम, ऊंचाई और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सेना के हेलिकॉप्टर केवल सैनिकों की आवाजाही के साधन नहीं, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा और बचाव अभियानों का महत्वपूर्ण आधार बन जाते हैं। इस अभियान में भी इसी क्षमता का इस्तेमाल किया गया।
चीतल हेलिकॉप्टर की ऊंचाई पर संचालन क्षमता
चीतल हेलिकॉप्टर को विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संचालन क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसमें आधुनिक और ईंधन-कुशल टीएम333-2एम2 इंजन लगाया गया है, जबकि स्वचालित बैकअप इंजन नियंत्रण प्रणाली इसकी परिचालन क्षमता को मजबूत करती है। चीटल परियोजना की शुरुआत करीब 25 वर्ष पहले ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य अभियानों की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से की गई थी। इसके विकास में रखरखाव को बेहतर बनाने और मध्य-जीवन उन्नयन के जरिए सुरक्षित तथा भरोसेमंद संचालन पर भी जोर दिया गया। लद्दाख जैसे इलाकों में जहां सड़क संपर्क सीमित है और मौसम तेजी से बदलता है, ऐसे हेलिकॉप्टर सेना के लिए बेहद अहम साबित होते हैं। हालांकि इतनी अधिक ऊंचाई पर प्रत्येक उड़ान अपने साथ अतिरिक्त जोखिम लेकर आती है और पायलटों को हर चरण में परिस्थितियों का बारीकी से आकलन करना पड़ता है।
3 महीने पहले भी हुआ था चीतल हादसा
चीतल हेलिकॉप्टर से जुड़ा यह साहसिक अभियान ऐसे समय हुआ है जब करीब 3 महीने पहले लेह के तांगत्से क्षेत्र में इसी प्रकार के एक हेलिकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना सामने आई थी। 20 मई को हुए उस हादसे में हेलिकॉप्टर में सवार 2 पायलट और एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी घायल हुए थे, लेकिन सभी की जान बच गई थी। दुर्घटना में शामिल अधिकारियों में लेफ्टिनेंट कर्नल, मेजर और करु स्थित 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल सचिन मेहता शामिल थे। उन्हें मामूली चोटें आई थीं और वे हादसे में बच निकलने में सफल रहे। ऐसे घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि लद्दाख की ऊंचाई और कठिन भूभाग में हेलिकॉप्टर संचालन कितना चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद आपात स्थितियों में सेना को इन्हीं हवाई संसाधनों के जरिए सबसे दुर्गम स्थानों तक पहुंचना पड़ता है।