देश में तेजी से बढ़ती बिजली की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने दीर्घकालिक रणनीति तैयार की है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने के साथ-साथ 2034-35 तक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन भी बढ़ाया जाएगा।
कोयला आधारित क्षमता में वृद्धि की योजना
सरकार के अनुसार, वर्ष 2034-35 तक अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने के लिए कुल तापीय क्षमता लगभग 3,07,000 मेगावाट तक पहुंचाने की आवश्यकता होगी। वर्तमान में कोयला और लिग्नाइट आधारित स्थापित क्षमता 2,11,855 मेगावाट के आसपास है। इस अंतर को पूरा करने के लिए करीब 97,000 मेगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की योजना बनाई गई है। यह कदम ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।
निर्माणाधीन और नई परियोजनाओं की स्थिति
अप्रैल 2023 से फरवरी 2026 के बीच लगभग 18,160 मेगावाट तापीय क्षमता का संचालन शुरू किया जा चुका है। इसके अलावा लगभग 40,865 मेगावाट की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इससे स्पष्ट है कि सरकार चरणबद्ध तरीके से ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर कार्य कर रही है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की कमी न हो।
नवीकरणीय और गैर-जीवाश्म ऊर्जा में तेज प्रगति
देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता 513.72 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा और बड़े जलविद्युत स्रोतों की हिस्सेदारी 258 गीगावाट, यानी लगभग 50 प्रतिशत से अधिक है। वहीं गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता, जिसमें परमाणु और अन्य स्वच्छ स्रोत शामिल हैं, 275.45 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
लक्ष्य की ओर बढ़ता भारत
राज्यसभा में जानकारी देते हुए श्रीपद नाईक ने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक अपने गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में सही मार्ग पर है। वर्तमान में 189.15 गीगावाट की परियोजनाएं आवंटित की जा चुकी हैं, जबकि 54.70 गीगावाट की परियोजनाएं निविदा प्रक्रिया में हैं।
संतुलन के साथ ऊर्जा सुरक्षा पर जोर
सरकार की यह रणनीति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि वह ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपना रही है। एक ओर जहां स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कोयला आधारित उत्पादन को भी बनाए रखा जा रहा है, ताकि देश की ऊर्जा आपूर्ति निर्बाध बनी रहे। यह संतुलन भविष्य में आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी दोनों को साधने में सहायक सिद्ध हो सकता है।