नई दिल्ली. करीब चार वर्षों तक निर्यात पर लगी पाबंदियों के बाद भारत ने वर्ष 2026 में 50 लाख टन गेहूं और 10 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को अनुमति देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में वापसी का रास्ता खोल दिया है। शुरुआती महीनों में निर्यात की गति अपेक्षाकृत धीमी रही, लेकिन हाल के दिनों में वैश्विक कीमतों में आई तेजी ने भारतीय निर्यातकों के लिए परिस्थितियां अनुकूल बना दी हैं। विशेष रूप से दक्षिण एशियाई देशों में भारतीय गेहूं की प्रतिस्पर्धात्मक कीमत और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति क्षमता के कारण मांग बढ़ने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहता है तो भारत आने वाले महीनों में वैश्विक गेहूं व्यापार में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय उत्पादन संकट ने बढ़ाई भारतीय गेहूं की मांग
वैश्विक जिंस बाजारों में पिछले एक महीने के दौरान गेहूं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों के अनुसार, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में प्रतिकूल मौसम, वर्षा की कमी और अल नीनो के प्रभाव से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय खरीदार वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहे हैं और भारत उनके लिए एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है। विशेष रूप से बांग्लादेश सहित कई पड़ोसी देशों से भारतीय गेहूं की खरीद को लेकर पूछताछ बढ़ना इस बदलते वैश्विक परिदृश्य का संकेत माना जा रहा है।
पर्याप्त सरकारी भंडार से निर्यात को मिला मजबूत आधार
भारत के पास वर्तमान समय में गेहूं का पर्याप्त रणनीतिक भंडार उपलब्ध है, जिससे घरेलू आवश्यकताओं के साथ-साथ निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। केंद्रीय भंडार में उपलब्ध गेहूं सार्वजनिक वितरण प्रणाली, विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं तथा आवश्यक बफर स्टॉक की जरूरत पूरी करने के बाद भी पर्याप्त मात्रा में बचा हुआ है। यही कारण है कि सरकार ने अतिरिक्त निर्यात को मंजूरी देते हुए यह स्पष्ट किया कि इससे भंडारण प्रबंधन बेहतर होगा, बाजार में संतुलन बना रहेगा और किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचने की मजबूरी का सामना नहीं करना पड़ेगा। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अधिशेष उत्पादन वाले वर्षों में संतुलित निर्यात नीति किसानों और अर्थव्यवस्था दोनों के हित में होती है।
घरेलू बाजार में भी दिख रहा कीमतों का असर
वैश्विक तेजी का असर देश के घरेलू बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। राजधानी दिल्ली सहित कई प्रमुख थोक मंडियों में पिछले एक महीने के दौरान गेहूं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि सरकार बाजार में कृत्रिम कमी और अत्यधिक मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए समय-समय पर खुली बाजार बिक्री योजना के माध्यम से अतिरिक्त गेहूं उपलब्ध करा रही है। इस नीति का उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करते हुए किसानों को भी उचित मूल्य सुनिश्चित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले समय में सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कृषि निर्यात में भारत की भूमिका हो सकती है और मजबूत
भारत पहले ही चावल, चीनी और कई कृषि उत्पादों के प्रमुख निर्यातकों में शामिल है। यदि गेहूं के निर्यात को भी दीर्घकालिक और संतुलित नीति के साथ आगे बढ़ाया जाता है, तो भारतीय कृषि क्षेत्र को नया आर्थिक आधार मिल सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ने, विदेशी मुद्रा अर्जित करने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भारत की भूमिका मजबूत होने की संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि गुणवत्ता मानकों, आधुनिक भंडारण, तेज लॉजिस्टिक्स और निर्यात अवसंरचना में सुधार के साथ भारत वैश्विक गेहूं बाजार में अपनी हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। वर्तमान परिस्थितियां इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखी जा रही हैं।