उत्तर प्रदेश के राज्य कर विभाग में 376 सहायक आयुक्तों के तबादलों को लेकर अब विवाद बढ़ता नजर आ रहा है। विभाग के अंदर ही स्थानांतरण प्रक्रिया और कुछ अधिकारियों की पोस्टिंग को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ ऐसे अधिकारियों को भी महत्वपूर्ण और संवेदनशील पदों पर तैनाती दी गई है, जिनके खिलाफ विभागीय जांच या सतर्कता जांच लंबित है।
376 अधिकारियों के तबादले पर उठे सवाल
राज्य कर विभाग में हाल ही में किए गए बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद अब कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कुछ स्थानांतरणों में तय नियमों और स्थानांतरण नीति का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। आरोप है कि कुछ अधिकारियों को दोबारा उन्हीं क्षेत्रों में तैनाती दे दी गई, जहां वे पहले लंबे समय तक कार्यरत रह चुके थे।
संवेदनशील पद पर दोबारा तैनाती का आरोप
सबसे ज्यादा चर्चा एक सहायक आयुक्त की तैनाती को लेकर हो रही है। बताया जा रहा है कि संबंधित अधिकारी पहले करीब चार साल तक गाजियाबाद सचल दल में तैनात रह चुकी थीं। विभागीय नियमों के अनुसार, किसी अधिकारी का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद उसी जिले में दोबारा तैनाती को लेकर प्रतिबंध होता है। इसके बावजूद आरोप है कि उन्हें फिर से गाजियाबाद भेजकर टैक्स ऑडिट जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी दी गई।
सेवा रिकॉर्ड में बदलाव का भी आरोप
इस मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, विभागीय पोर्टल पर संबंधित अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड में बदलाव किए जाने की बात कही जा रही है। आरोप है कि पिछली गाजियाबाद पोस्टिंग की जगह आगरा की तैनाती दर्ज कर दी गई, जबकि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अधिकारी की आगरा में तैनाती नहीं रही। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि विभाग की ओर से नहीं की गई है।
जांच लंबित अधिकारियों की पोस्टिंग पर विवाद
विभाग में उन अधिकारियों की तैनाती को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनके खिलाफ कथित तौर पर-
आय से अधिक संपत्ति से जुड़ी जांच,
सतर्कता जांच,
विभागीय जांच
जैसे मामले लंबित बताए जा रहे हैं।
आरोप है कि कुछ अधिकारियों को जांच पूरी होने से पहले ही दोबारा सचल दल जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियां दे दी गईं।
निष्पक्ष जांच की उठी मांग
कर्मचारी संगठनों और विभाग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि यदि सेवा रिकॉर्ड में किसी तरह का बदलाव कर स्थानांतरण किए गए हैं तो पूरे मामले की जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि पारदर्शी जांच से ही स्थानांतरण प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का समाधान हो सकता है और विभाग की विश्वसनीयता बनी रहेगी।
छह महीने बाद भी अधिकारी नहीं हुए कार्यमुक्त
इस बीच मुख्यालय स्तर पर तैनात एक अपर आयुक्त का मामला भी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि उनका तबादला फरवरी में गोरखपुर कर दिया गया था, लेकिन करीब छह महीने बाद भी उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया। विभागीय सूत्रों का दावा है कि अब इस तबादले को निरस्त या संशोधित कराने की कोशिशें भी चल रही हैं।
विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं
पूरे मामले को लेकर अभी तक राज्य कर विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।