मत्स्य पालन सब्सिडी के मुद्दे पर भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना रुख और अधिक सख्त कर दिया है। विश्व व्यापार संगठन के मंच पर भारत ने 25 वर्षों की विशेष छूट की मांग रखते हुए विकासशील देशों के हितों की जोरदार वकालत की है। यह मांग ऐसे समय में उठाई गई है, जब वैश्विक स्तर पर समुद्री संसाधनों के संरक्षण और व्यापार संतुलन को लेकर बहस तेज हो रही है।
मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में सक्रिय भूमिका
कैमरून के याउंडे में आयोजित डब्ल्यूटीओ के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उभरा। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे पीयूष गोयल ने इस विषय पर भारत की चिंताओं और प्राथमिकताओं को मजबूती से रखा। इस सम्मेलन में मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते के दूसरे चरण की रूपरेखा तय करने पर भी चर्चा हुई, जिसमें भारत ने सक्रिय योगदान दिया।
पारंपरिक मछुआरों के हितों की सुरक्षा
भारत ने स्पष्ट किया कि मत्स्य पालन क्षेत्र देश की खाद्य सुरक्षा और रोजगार का एक महत्वपूर्ण आधार है। देश में 90 लाख से अधिक मछुआरा परिवार इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, जिनमें अधिकांश छोटे और पारंपरिक मछुआरे शामिल हैं। भारत ने मांग की कि इन समुदायों को स्थायी छूट प्रदान की जाए, ताकि उनकी आजीविका पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और वे अपने पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ने का कार्य जारी रख सकें।
औद्योगिक देशों के लिए कड़े नियमों की पैरवी
भारत ने यह भी जोर देकर कहा कि गहरे समुद्र में बड़े औद्योगिक बेड़ों द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक मछली शिकार पर सख्त नियम लागू किए जाने चाहिए। भारत ने अपने पक्ष में यह तर्क रखा कि वह न तो एक बड़ा औद्योगिक मछली पकड़ने वाला देश है और न ही उसके पास विशाल मशीनों और आधुनिक तकनीकों से लैस बड़े बेड़े हैं। इसलिए एक समान नियम सभी देशों पर लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।
न्यूनतम सब्सिडी और संतुलित दृष्टिकोण
भारत ने यह भी बताया कि उसकी ओर से दी जाने वाली मत्स्य पालन सब्सिडी विश्व में सबसे कम स्तर पर है, जो प्रति मछुआरा परिवार सालाना लगभग 15 डॉलर के आसपास है। ऐसे में भारत ने यह स्पष्ट किया कि विकासशील देशों पर कठोर प्रतिबंध लगाना उनके आर्थिक और सामाजिक ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए निर्णय लेते समय संतुलन और न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
समानता और न्याय पर आधारित समाधान की मांग
भारत ने डब्ल्यूटीओ के मंच से यह संदेश दिया कि किसी भी वैश्विक समझौते में समानता और न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। विशेष रूप से कमजोर और विकासशील देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही नीतियां बनाई जानी चाहिए, ताकि वैश्विक व्यापार में संतुलन बना रहे और किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।