आधुनिक हवाई युद्ध में स्टील्थ तकनीक को निर्णायक बढ़त का आधार माना जाता है। यह तकनीक विमान की रडार पर पहचान की संभावना को काफी कम कर देती है, जिससे दुश्मन के वायु रक्षा तंत्र को चकमा देकर मिशन पूरा करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार चीन ने पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आकलनों के मुताबिक चीन के पास बड़ी संख्या में परिचालन योग्य ‘J-20’ स्टील्थ लड़ाकू विमान हैं और उनका उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। हालांकि इन अनुमानों की स्वतंत्र पुष्टि सभी मामलों में उपलब्ध नहीं है, फिर भी चीन की बढ़ती क्षमता को वैश्विक रक्षा समुदाय गंभीरता से देख रहा है।
तिब्बत में तैनाती से भारत की सामरिक चिंता बढ़ी
भारत-चीन सीमा के निकट तिब्बत क्षेत्र में उन्नत लड़ाकू विमानों की तैनाती को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऊंचाई वाले सैन्य अड्डों से संचालित आधुनिक लड़ाकू विमान सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रतिक्रिया समय कम कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर तेज़ी से अभियान चला सकते हैं। ऐसे परिदृश्य में भारतीय वायुसेना को अपनी निगरानी, वायु रक्षा और प्रतिरोधक क्षमता को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में तकनीकी बढ़त भविष्य के किसी भी संभावित संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत के पास फिलहाल परिचालन स्टील्थ फाइटर नहीं, लेकिन ‘AMCA’ पर उम्मीदें
भारत के पास वर्तमान समय में कोई भी पूर्ण रूप से परिचालन पाँचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान सेवा में नहीं है। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए स्वदेशी ‘उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान’ अर्थात ‘AMCA’ परियोजना विकसित की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय वायुसेना को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप स्टील्थ क्षमता, अत्याधुनिक सेंसर, नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली और आधुनिक हथियारों से लैस स्वदेशी लड़ाकू विमान उपलब्ध कराना है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता और सामरिक क्षमता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगी, हालांकि इसके परिचालन सेवा में आने में अभी समय लगेगा।
राफेल और अन्य विमानों की क्षमता क्या है?
भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल राफेल अत्याधुनिक 4.5 पीढ़ी का बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इसमें रडार पहचान कम करने वाली कुछ विशेषताएं अवश्य हैं, लेकिन इसे पूर्ण स्टील्थ लड़ाकू विमान की श्रेणी में नहीं रखा जाता। इसके बावजूद इसकी लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता, आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और उन्नत मिसाइलें इसे दुनिया के सबसे प्रभावी लड़ाकू विमानों में शामिल करती हैं। इसी प्रकार रूस का ‘एसयू-57’ भी स्टील्थ क्षमता वाला विमान है, लेकिन विभिन्न रक्षा विश्लेषकों के बीच उसकी स्टील्थ प्रभावशीलता को लेकर अलग-अलग मत रहे हैं। आधुनिक वायु युद्ध केवल स्टील्थ तकनीक पर नहीं, बल्कि सेंसर, नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मिसाइल क्षमता के संयुक्त प्रदर्शन पर भी निर्भर करता है।
भविष्य की वायु शक्ति में तकनीकी आत्मनिर्भरता होगी निर्णायक
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में केवल लड़ाकू विमानों की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी तकनीकी गुणवत्ता, स्वदेशी उत्पादन क्षमता और तेज़ी से आधुनिकीकरण की क्षमता भी निर्णायक होगी। भारत ‘AMCA’, उन्नत इंजन विकास, स्वदेशी रडार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली और आधुनिक मिसाइल कार्यक्रमों पर तेजी से काम कर रहा है। साथ ही वायुसेना के समग्र आधुनिकीकरण, बहुस्तरीय वायु रक्षा और अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमता को भी मजबूत किया जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य का सामरिक संतुलन केवल एक विमान से नहीं, बल्कि संपूर्ण रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती से तय होगा।