राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति और एकता को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इन्फोसिस थिएटर में हुए इस कार्यक्रम में 39 अमेरिकी राज्यों और 853 शहरों से लोग शामिल हुए। कार्यक्रम में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के 6,000 से अधिक सदस्यों के साथ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। भागवत ने कहा कि भारत की पहचान केवल उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को एक सूत्र में बांधने वाली एकता में भी निहित है। उन्होंने इस भावना को भारत के मूल संस्कारों और सामूहिक चेतना का हिस्सा बताते हुए इसे दुनिया के सामने साझा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
“एकता और विविधता भारत के डीएनए में”
भागवत ने अमेरिका और भारत की सामाजिक संरचना के बीच तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका की चर्चा के साथ अक्सर बहुलतावाद का विचार सामने आता है, जबकि भारत के संदर्भ में ‘विविधता में एकता’ की अवधारणा प्रमुख है। उनके अनुसार भारत के लिए एकता और विविधता दोनों ही उसके डीएनए में मौजूद हैं और इन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि विविधता को मनाना, उसका सम्मान करना और उसे स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ समाज में एकता की भावना को भी बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक राष्ट्र के सामने एक उद्देश्य और एक नियति होती है। भागवत के मुताबिक भारत की भूमिका ऐसी एकता को समझने और समय-समय पर दुनिया को भी उसका अहसास कराने की है।
विविधता को टकराव नहीं, शक्ति के रूप में देखने की अपील
अपने करीब 1 घंटे के संबोधन में भागवत ने विविधता को सामाजिक विभाजन के बजाय सामूहिक शक्ति के रूप में देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदायों, विचारों और परंपराओं के बावजूद मनुष्यों के बीच एक साझा संबंध मौजूद है। उनके संदेश का केंद्र यह विचार रहा कि विविधता तभी सार्थक बनती है, जब उसके भीतर एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनत्व की भावना बनी रहे। उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद मतभेदों के बावजूद मानव समाज को परस्पर जुड़ाव और जिम्मेदारी की भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इसी संदर्भ में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भारतीय अवधारणा को कार्यक्रम की व्यापक भावना से जोड़ा गया, जिसका अर्थ पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने से है। कार्यक्रम के आयोजकों ने भी इसे एकता, सेवा, संवाद और सामंजस्य पर केंद्रित आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया था।
अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को कर्मभूमि का संदेश
भागवत ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की सामाजिक जिम्मेदारियों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जो लोग अमेरिका में रहते हैं, काम करते हैं और अपना जीवन आगे बढ़ाते हैं, उन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से स्थानीय समाज के लिए योगदान करने और जिस देश में वे रहते हैं, वहां की सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने की अपील की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करने की इच्छा अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन पहले अपनी कर्मभूमि के प्रति कर्तव्य निभाना आवश्यक है। उनके इस संदेश को प्रवासी भारतीय समुदाय की दोहरी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक दायित्वों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कमाई से ज्यादा जरूरी है समाज को लौटाना
भागवत ने अपने संबोधन में आर्थिक सफलता की परिभाषा को लेकर भी विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जीवन की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति कितना कमाता है, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि वह समाज और दुनिया को कितना वापस देता है। उन्होंने इस विचार को पारस्परिक निर्भरता से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ प्राप्त करता है, उसमें असंख्य लोगों का योगदान शामिल होता है। इसलिए समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना और जरूरतमंदों के लिए योगदान करना भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। उनके अनुसार व्यक्तिगत उपलब्धि तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करती है, जब उसका लाभ समाज के दूसरे लोगों तक भी पहुंचे। यह विचार कार्यक्रम के सेवा और सामुदायिक जिम्मेदारी के व्यापक संदेश से भी जुड़ा रहा।
6,000 से अधिक लोगों की मौजूदगी ने बनाया बड़ा मंच
‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ का आकार भी इस आयोजन को खास बनाता है। इसमें अमेरिका के 39 राज्यों और 853 शहरों से लोगों की भागीदारी रही। विभिन्न विश्वविद्यालयों के 250 से अधिक छात्र और करीब 250 संगठन भी कार्यक्रम से जुड़े। आयोजकों के अनुसार यह आयोजन भारतीय दर्शन की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को व्यापक अमेरिकी समुदाय के सामने रखने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भागीदारी रही। यह आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान उसके वैश्विक संपर्क कार्यक्रमों के क्रम में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत की विचार परंपरा को वैश्विक मंच पर रखने की कोशिश
न्यूयॉर्क में भागवत का संबोधन ऐसे समय हुआ है जब भारतीय मूल के समुदाय और भारत से जुड़े सांस्कृतिक संगठनों की अमेरिका में सार्वजनिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। इस आयोजन के माध्यम से भारतीय दर्शन, सामाजिक समरसता और विविधता में एकता जैसे विचारों को वैश्विक मंच पर सामने रखने की कोशिश दिखाई दी। भागवत ने अपने संबोधन में भारत की विविधता को केवल सांस्कृतिक विशेषता नहीं, बल्कि दुनिया के लिए एक संभावित संदेश के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार अलग-अलग पहचान और विचारों के बावजूद एक साझा मानवीय भावना विकसित की जा सकती है। यही विचार उनके न्यूयॉर्क संबोधन का केंद्रीय संदेश रहा कि विविधता को स्वीकार करते हुए एकता की भावना को मजबूत किया जाए और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को केवल व्यक्तिगत हितों तक सीमित न रखा जाए।