पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और तेज बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाने का निर्णय लिया है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पर्यावरण प्रभाव आकलन से संबंधित एक स्थायी प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी, जो उन परिस्थितियों में परियोजनाओं का मूल्यांकन करेगा जब राज्यों के स्तर पर संबंधित संस्थाएं कार्यरत नहीं होंगी। इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया अनावश्यक देरी का शिकार न हो और विकासात्मक कार्य समय पर आगे बढ़ सकें।
राज्य स्तरीय संस्थाओं की सीमित अवधि
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण तथा राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति का कार्यकाल सामान्यतः तीन वर्षों का होता है, जिसे अधिकतम एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। इन संस्थाओं की समय सीमा समाप्त होने पर इनके पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की जाती है, किंतु कई बार राज्यों की ओर से प्रस्ताव देर से या अधूरे रूप में भेजे जाने के कारण यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप संबंधित संस्थाएं कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाती हैं और परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया ठप पड़ जाती है।
लंबित प्रस्तावों से बढ़ती है प्रशासनिक जटिलता
जब राज्य स्तर पर संबंधित प्राधिकरण या समिति कार्य नहीं कर पाती, तब उनके अधिकार क्षेत्र की परियोजनाओं का मूल्यांकन केंद्रीय स्तर पर किया जाता है। ऐसे मामलों में लंबित प्रस्ताव बड़ी संख्या में केंद्र के पास पहुंच जाते हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया में अतिरिक्त समय लगने लगता है। इससे न केवल परियोजनाओं की समय सीमा प्रभावित होती है बल्कि प्रशासनिक जटिलताएं भी बढ़ जाती हैं।
निवेशकों के विश्वास पर पड़ता है प्रभाव
पर्यावरणीय मंजूरी में लगातार देरी होने का सीधा असर निवेशकों के विश्वास पर भी पड़ता है। परियोजनाओं की स्वीकृति में अनिश्चितता के कारण उद्योग और अवसंरचना क्षेत्र से जुड़े निवेशक अक्सर निर्णय लेने में संकोच करते हैं। प्रस्तावित स्थायी प्राधिकरण की स्थापना से उम्मीद है कि ऐसी परिस्थितियों में परियोजनाओं के मूल्यांकन की प्रक्रिया बिना रुकावट जारी रह सकेगी और निवेशकों को स्पष्टता मिलेगी।
विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन
सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। स्थायी प्राधिकरण के माध्यम से परियोजनाओं का वैज्ञानिक और समयबद्ध मूल्यांकन किया जा सकेगा, जिससे पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करते हुए विकास कार्यों को भी गति दी जा सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो पर्यावरणीय प्रशासन में पारदर्शिता और दक्षता दोनों में सुधार संभव है।
Comments (0)