नई दिल्ली - शिक्षा व्यवस्था में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पिछले 17 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। लगातार उपवास के कारण उनकी सेहत चिंताजनक होती जा रही है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से उनकी मांगों पर कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।

17 दिन की भूख हड़ताल, 8.5 किलो घटा वजन
आंदोलन से जुड़े संगठन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुताबिक, भूख हड़ताल शुरू होने के समय सोनम वांगचुक का वजन 67 किलोग्राम था, जो अब घटकर करीब 58.5 किलोग्राम रह गया है। यानी अब तक उनका 8.5 किलोग्राम वजन कम हो चुका है। संगठन का कहना है कि लगातार उपवास के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर होती जा रही है और उनकी जान को खतरा हो सकता है।
सरकार पर लगाए अनदेखी के आरोप
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि सरकार ने अब तक आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते बातचीत शुरू नहीं हुई तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। उन्होंने सरकार से मांग की कि परीक्षा अनियमितताओं के मुद्दे पर जल्द समाधान निकाला जाए और आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित किया जाए।
कई नेताओं और हस्तियों ने की मुलाकात
सोनम वांगचुक के समर्थन में कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक हस्तियों ने उनसे मुलाकात की या उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी भी उनसे मिलने जंतर-मंतर पहुंचीं। इसके अलावा समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह और लेखिका अरुंधति रॉय समेत कई प्रमुख हस्तियों ने उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की है।
पहले भी लंबा आंदोलन कर चुके हैं वांगचुक
सोनम वांगचुक इससे पहले भी लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन कर चुके हैं। उस आंदोलन के दौरान उन्हें करीब 170 दिन तक जोधपुर जेल में भी रहना पड़ा था। अब वे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और पेपर लीक मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर फिर से अनिश्चितकालीन आंदोलन पर बैठे हैं।
सरकार के रुख पर टिकी निगाहें
सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत और बढ़ते जनसमर्थन के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार उनसे बातचीत कर कोई समाधान निकालने की पहल करेगी। फिलहाल आंदोलन जारी है और सभी की निगाहें सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं।