नई दिल्ली. अल नीनो इस बार अपने अब तक के सबसे ताकतवर रूप में सामने आ सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO के ताजा मौसमी पूर्वानुमान के मुताबिक नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच अल नीनो से जुड़ा समुद्री सतह का तापमान औसत से 3.8 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। इसके दिसंबर में चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ सकता है। कई इलाकों में सामान्य से ज्यादा गर्मी पड़ने और दक्षिण व दक्षिण पूर्व एशिया में बारिश कमजोर रहने की आशंका व्यक्त की गई है। भारत भी इस वैश्विक प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। मौसम वैज्ञानिक इस पूर्वानुमान को गंभीरता से ले रहे हैं।
दिसंबर में चरम पर पहुंचने का पूर्वानुमान
WMO के आकलन के अनुसार अल नीनो 2026 के आखिर में यानी दिसंबर के आसपास अपनी चरम तीव्रता पर पहुंचेगा। समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होगा। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य या उससे ऊपर रह सकते हैं। गर्मी बढ़ने के साथ ही वर्षा पैटर्न में भी बदलाव आने की आशंका है। कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति तो कुछ में अचानक भारी बारिश और बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह दोहरा प्रभाव कृषि और जल संसाधनों के लिए चुनौती बन सकता है।
चार दशक के रिकॉर्ड से बाहर जा सकती है तीव्रता
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने बुधवार को जानकारी देते हुए कहा कि मौजूदा स्थिति पिछले चार दशकों से इस्तेमाल किए जा रहे निगरानी मानकों के दायरे से भी बाहर है। संगठन ने संकेत दिया है कि इस बार अल नीनो की ताकत असाधारण हो सकती है। पिछले कई वर्षों के आंकड़ों से तुलना करने पर यह तीव्रता असामान्य प्रतीत हो रही है। अल नीनो के प्रभाव लंबे समय तक महसूस किए जा सकते हैं भले ही यह दिसंबर में चरम पर पहुंच जाए। जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में ऐसे शक्तिशाली अल नीनो की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। वैज्ञानिक समुदाय इस विकास पर बारीकी से नजर रखे हुए है।
दक्षिण एशिया में तापमान और बारिश पर संभावित असर
WMO के दक्षिण एशिया संबंधी पूर्वानुमान के अनुसार इस क्षेत्र के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे ऊपर रहने की संभावना है। इस क्षेत्र में भारत के अलावा अफगानिस्तान बांग्लादेश भूटान मालदीव म्यांमार नेपाल पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। संगठन ने बताया कि दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली बारिश कृषि गतिविधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खास तौर पर दक्षिण भारत श्रीलंका और मालदीव में इस अवधि के दौरान अच्छी मात्रा में बारिश होती है। अफगानिस्तान समेत क्षेत्र के पूर्वोत्तर हिस्सों में भी इन महीनों के दौरान सालाना बारिश का एक बड़ा हिस्सा दर्ज किया जाता है।
भारत के लिए विशेष चिंता का विषय
भारत में बारिश के लिहाज से यह चेतावनी बेहद महत्वपूर्ण है। दक्षिण भारत में उत्तर पूर्वी मानसून के मौसम में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। इससे रबी फसलों की बुवाई और जल संचय प्रभावित हो सकता है। वहीं कुछ क्षेत्रों में असामान्य गर्मी से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। दूसरी ओर कुछ हिस्सों में अचानक भारी वर्षा और बाढ़ का खतरा भी बना रह सकता है। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में मौसम के मिजाज में इस तरह का बदलाव खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोनों को प्रभावित कर सकता है। जल संसाधन प्रबंधन पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना है।
लंबे समय तक महसूस होने वाला प्रभाव और तैयारी
अल नीनो का असर केवल दिसंबर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाले महीनों में भी महसूस किया जा सकता है। तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव से स्वास्थ्य ऊर्जा मांग और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते तैयारी और अनुकूलन उपाय अपनाने से जोखिम को कम किया जा सकता है। फसल विविधीकरण जल संरक्षण और मौसम आधारित बीमा जैसी योजनाओं को मजबूत करने की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर जलवायु निगरानी और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों को इस पूर्वानुमान को गंभीरता से लेते हुए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी।