सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और मेरिट को लेकर लंबे समय से चले आ रहे भ्रम को दूर करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई उम्मीदवार परीक्षा प्रक्रिया के किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ उठाता है, तो वह बाद में सामान्य श्रेणी की सीट पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला UPSC और अन्य सिविल सेवा परीक्षाओं पर समान रूप से लागू होगा और चयन प्रक्रिया में स्पष्टता लाएगा।
किस पीठ ने सुनाया फैसला
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यह अहम निर्णय सुनाया। पीठ ने कहा कि आरक्षण का लाभ लेने के बाद उम्मीदवार की श्रेणी तय हो जाती है और पूरी चयन प्रक्रिया में उसे उसी श्रेणी के अंतर्गत माना जाएगा। भले ही बाद के चरणों में उसका प्रदर्शन सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर क्यों न हो।
2013 की IFS परीक्षा से जुड़ा मामला
यह मामला वर्ष 2013 की भारतीय वन सेवा परीक्षा से संबंधित है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के पक्ष में फैसला देते हुए उसे जनरल कैडर आवंटित करने का निर्देश दिया था, क्योंकि अंतिम मेरिट सूची में उसकी रैंक बेहतर थी। केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा गया
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए केंद्र सरकार की दलीलों को स्वीकार कर लिया। अदालत ने कहा कि परीक्षा नियमों की अनदेखी कर केवल अंतिम रैंक के आधार पर कैडर आवंटन नहीं किया जा सकता। यदि उम्मीदवार ने प्रारंभिक स्तर पर आरक्षित श्रेणी का लाभ लिया है, तो वह सामान्य श्रेणी की प्रतिस्पर्धा से स्वतः बाहर हो जाता है।
क्या था विवाद का मूल कारण
अदालत ने 2013 की परीक्षा के अंकों और कटऑफ का विश्लेषण करते हुए स्थिति स्पष्ट की। सामान्य वर्ग का कटऑफ 267 अंक था। अनुसूचित जाति के उम्मीदवार जी. किरण ने 247.18 अंक प्राप्त कर आरक्षित श्रेणी के तहत प्रीलिम्स पास किया, जबकि एंटनी एस. मारियप्पा ने 270.68 अंक हासिल कर सामान्य कटऑफ पार किया। अंतिम मेरिट में किरण की रैंक बेहतर होने के बावजूद, अदालत ने माना कि जनरल इनसाइडर सीट पर दावा केवल उस उम्मीदवार का बनता है जिसने शुरू से सामान्य श्रेणी के मानकों पर परीक्षा दी हो।
नियम 2013 को बताया सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि UPSC परीक्षा नियम 2013 इस मामले में निर्णायक हैं। यदि किसी उम्मीदवार ने प्रारंभिक चरण में ही कम अंक होने के कारण आरक्षण का सहारा लिया है, तो वह अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं हो सकता। अदालत ने इसे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया।
अभ्यर्थियों पर क्या पड़ेगा असर
इस फैसले का सीधा असर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ेगा। अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई उम्मीदवार जनरल सीट पर नियुक्ति चाहता है, तो उसे परीक्षा के पहले चरण से ही सामान्य श्रेणी के सभी मानदंड पूरे करने होंगे। यह फैसला भविष्य में चयन प्रक्रिया से जुड़े कई विवादों को खत्म करने में अहम भूमिका निभाएगा।
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