कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'महिला वोट बैंक' हमेशा से निर्णायक रहा है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी जिलावार आंकड़ों के अनुसार, उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक, महिलाओं ने मतदान के मामले में पुरुषों को न केवल कड़ी टक्कर दी, बल्कि कई जगहों पर उन्हें पीछे छोड़ दिया है।
जिलों में महिला वोटों की 'सुनामी'
आंकड़ों पर नजर डालें तो कूचबिहार से लेकर मुर्शिदाबाद तक हर जगह महिलाओं की स्वैच्छिक भागीदारी ने वोटिंग प्रतिशत को आसमान पर पहुंचा दिया है:
कूचबिहार: यहाँ 10.5 लाख से अधिक महिलाओं ने वोट दिया, जो करीब 96% मतदान है।
मुर्शिदाबाद: 23 लाख से अधिक महिलाओं की भागीदारी के साथ मतदान का उच्चतम स्तर देखा गया।
मालदह और बीरभूम: यहाँ भी महिलाओं ने क्रमश: 12.9 लाख और 12.5 लाख की संख्या में पहुंचकर रिकॉर्ड तोड़ उपस्थिति दर्ज कराई।
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं का दबदबा
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार पहाड़ से लेकर मैदान तक की तस्वीर एक जैसी है। दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जैसे पहाड़ी इलाकों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के बराबर रही। वहीं, जंगलमहल और उत्तर बंगाल के ग्रामीण बूथों पर सुबह से ही महिलाओं की लंबी कतारों ने यह साफ कर दिया कि ग्रामीण महिलाएं राजनीति को लेकर अब काफी जागरूक हो चुकी हैं।
महिलाएं बूथ तक क्यों पहुँचीं?
राजनीतिक गलियारों में इस भारी मतदान के पीछे तीन मुख्य कारण माने जा रहे हैं:
1. सरकारी योजनाओं का प्रभाव: 'लक्ष्मी भंडार' जैसी वित्तीय सहायता योजनाओं ने महिलाओं को सीधे तौर पर राजनीति से जोड़ा है।
2. निर्णय लेने की शक्ति: परिवार और समाज में अपनी अहमियत को लेकर अब महिलाएं पहले से कहीं अधिक सचेत हैं।
3. सुरक्षित माहौल: मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम और बेहतर प्रबंधन ने महिलाओं को निडर होकर घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया।
किसका चमकेगा भाग्य?
भारी मतदान के बाद अब श्रेय लेने की होड़ मच गई है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दावा है कि 'लक्ष्मी भंडार' और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए महिलाओं ने उन्हें वोट दिया है। दूसरी ओर, भाजपा (BJP) का तर्क है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार के विरोध में माताओं-बहनों ने 'परिवर्तन' के लिए मतदान किया है।
अब सबकी नजरें 4 मई के नतीजों पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो जाएगा कि बंगाल की 'लक्ष्मी' ने अपना आशीर्वाद आखिर किसे दिया है।