हनुमान जी को सनातन परंपरा में अखंड ब्रह्मचारी माना गया है, जिनकी साधना का केंद्र निष्ठा, त्याग और अप्रतिम शक्ति है। उनके इसी ब्रह्मचर्य स्वरूप का सम्मान करने के लिए स्त्रियों के चरण-स्पर्श पर परंपरागत मर्यादा रखी गई। यह किसी प्रकार का निषेध नहीं, बल्कि उनके तपस्वी व्यक्तित्व की पवित्रता के संरक्षण का भाव है, जिसकी जड़ें भारतीय आस्था में गहराई से जुड़ी हैं।
स्त्रीत्व के प्रति हनुमान जी की दृष्टि और आदर का भाव
रामायण में वर्णित प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि हनुमान जी सभी स्त्रियों को मातृभाव से देखते हैं। लंका में सीता माता की खोज करते समय उनकी दृष्टि, वाणी और आचरण इस आदर्श का अनुपम उदाहरण हैं। इसी समझ को परंपरा में आगे बढ़ाते हुए यह मान्यता बनी कि महिलाए उनके चरणों का स्पर्श न करें, जिससे मातृत्व का सम्मान और ब्रह्मचर्य की मर्यादा दोनों का पालन होता रहे।
क्या महिलाए हनुमान जी की पूजा कर सकती हैं?
यह भ्रम पूरी तरह निराधार है कि महिलाए हनुमान जी की पूजा या भक्ति नहीं कर सकतीं। महिलाए हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, बजरंग बाण सहित सभी स्तोत्रों का पाठ कर सकती हैं और दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित कर सकती हैं। भक्ति में मन की शुद्धि, भावनाओं की गहराई और समर्पण सर्वोच्च होते हैं, न कि कोई प्रतिबंध जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा में बाधा बने।
परंपरा में चरण-स्पर्श निषेध का सांस्कृतिक तर्क
भारतीय संस्कृति में चरण-स्पर्श गुरु, माता-पिता और देवत्व के प्रति आदर का प्रतीक है, परंतु ब्रह्मचर्य मार्ग पर चलने वाले देवों के लिए यह अलग मर्यादाए निर्धारित की गई हैं। हनुमान जी के चरणों का स्पर्श न करना इसी भावना से उत्पन्न परंपरा है। यह नियम समय के साथ एक विश्वास और संस्कार में बदल गया, जो उनकी तपस्वी महत्ता के अनुरूप माना जाता है।
भक्ति में महिलाओं की आस्था का महत्व और पूर्ण स्वीकार्यता
सनातन धर्म की दृष्टि से स्त्री-पुरुष दोनों की भक्ति समान रूप से स्वीकार्य है। हनुमान जी की कृपा के लिए कोई लिंग-आधारित सीमा नहीं मानी गई। महिलाएं पूरी श्रद्धा से उनकी आराधना कर सकती हैं और उन्हें सिद्धि, सुरक्षा और शक्ति प्रदाता के रूप में पूजती हैं। मर्यादाएं केवल सांस्कृतिक हैं, आस्था पर आधारित नहीं, और इनका उद्देश्य भक्ति को सीमित करना नहीं बल्कि दिव्य स्वरूप का सम्मान करना है।
आधुनिक समय में मान्यताओं की भावनात्मक व्याख्या
वर्तमान समय में इन परंपराओं को प्रतिबंध समझने के बजाय भावनात्मक आस्था का हिस्सा माना जाना चाहिए। यह मान्यताएं भक्ति के मार्ग में अवरोध नहीं बल्कि हनुमान जी के स्वरूप, गुणों और तप की महिमा का सूक्ष्म स्मरण कराती हैं। महिलाएं न केवल उनकी उपासक हैं बल्कि भक्ति जगत में शक्ति और निष्ठा का प्रतीक भी मानी जाती हैं।
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