मकर संक्रांति को प्रायः सूर्य के राशि परिवर्तन से जोड़ा जाता है, किंतु भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इसका अर्थ कहीं अधिक गहन है। जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है, तब यह केवल दिशा परिवर्तन नहीं करता, बल्कि चेतना के प्रवाह को भी ऊपर की ओर मोड़ता है। यह पर्व तमस से सत्त्व, जड़ता से चेतना और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का प्रतीक बन जाता है। मकर संक्रांति हमें यह स्मरण कराती है कि जैसे सूर्य अपना पथ बदलता है, वैसे ही मानव जीवन को भी आत्मोन्नति की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।
तिल: सूक्ष्म में निहित विराट सत्य
मकर संक्रांति पर तिल का विशेष महत्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक संकेत से जुड़ा है। तिल आकार में अत्यंत सूक्ष्म है, किंतु उसमें ऊर्जा, उष्णता और पोषण का विराट भंडार समाहित है। यह उपनिषदों के उस सिद्धांत की स्मृति कराता है कि अणु में ही ब्रह्म का वास है। तिल का दान और सेवन इस बात का प्रतीक है कि साधक अहंकार के सूक्ष्म बीजों का त्याग कर आत्म-तत्व को पोषित करे।
उष्णता और चेतना का जागरण
शीत ऋतु के मध्य आने वाला यह पर्व बाह्य ठंड के बीच अंतः अग्नि को प्रज्वलित करने का संदेश देता है। तिल और गुड़ जैसे उष्ण पदार्थ केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन और प्राण को भी ऊष्मा प्रदान करते हैं। यह ऊष्मा जठराग्नि से आगे बढ़कर प्राणाग्नि और अंततः चेतना की अग्नि में रूपांतरित होती है। योग-दर्शन के अनुसार यह काल साधक के लिए ऊर्जा को अधः प्रवृत्तियों से ऊपर उठाने और अंतःशुद्धि को तीव्र करने का श्रेष्ठ अवसर है।
मकर राशि और कर्म-दर्शन का संदेश
मकर राशि के स्वामी शनि को कर्म, अनुशासन और तप का प्रतीक माना जाता है। मकर संक्रांति यह स्पष्ट संकेत देती है कि आध्यात्मिक उन्नति केवल भावनात्मक भक्ति से नहीं, बल्कि निरंतर साधना, धैर्य और आत्मसंयम से प्राप्त होती है। यह पर्व सिखाता है कि भक्ति और विवेक का संतुलन ही तत्व-ज्ञान का आधार है और आत्मबोध के लिए स्थिरता व दृढ़ता अनिवार्य है।
पंचतत्वों का संतुलन और आत्मबोध
भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य पंचतत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित है। मकर संक्रांति इन तत्वों के संतुलन का पर्व है। पृथ्वी स्थिरता देती है, जल संवेदनशीलता जगाता है, अग्नि ऊर्जा प्रदान करती है, वायु गति का संचार करती है और आकाश चेतना का विस्तार करता है। जब ये पाँचों तत्व संतुलित होते हैं, तभी आत्मबोध की संभावना साकार होती है।
उत्तरायण: चेतना के ऊर्ध्व मार्ग का संकेत
शास्त्रों में उत्तरायण को देवयान कहा गया है, अर्थात वह मार्ग जो चेतना को उच्च स्तरों की ओर ले जाता है। भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा इस सत्य को दर्शाती है कि जीवन का मूल्य केवल देह-त्याग में नहीं, बल्कि सही चेतना में प्रवेश करने में है। मकर संक्रांति यह बोध कराती है कि जीवन का लक्ष्य भोग नहीं, बल्कि विवेक, वैराग्य और मुक्ति है।
सामाजिक समरसता और अद्वैत भाव
तिल और गुड़ का आदान-प्रदान केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि अद्वैत दर्शन का व्यावहारिक रूप है। तिल जीवन की कठोर सच्चाइयों का प्रतीक है और गुड़ मधुरता व करुणा का। दोनों का संगम यह सिखाता है कि सत्य को प्रेम और संवेदनशीलता के साथ जिया जाए। यह पर्व सामाजिक भेदों को पिघलाकर समरसता और एकता की भावना को सुदृढ़ करता है।
तत्व-ज्ञान से आत्म-ज्ञान तक की यात्रा
मकर संक्रांति अंततः आत्मचिंतन का पर्व है। यह प्रश्न उठाती है कि सूर्य तो उत्तरायण हो गया, किंतु क्या हमारी चेतना भी ऊर्ध्व दिशा में गतिमान हुई है। स्नान, दान, जप और संयम साधन हैं, लक्ष्य है आत्म-ज्ञान। जब साधक पंचतत्वों से ऊपर उठकर अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार करता है, तभी इस पर्व की सार्थकता पूर्ण होती है।
भीतर के सूर्य का उदय
मकर संक्रांति यह स्मरण कराती है कि सच्चा उत्सव बाह्य अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण में निहित है। जब भीतर का सूर्य उत्तरायण होता है, तब जीवन स्वयं साधना बन जाता है और साधना उत्सव का रूप ले लेती है। यही मकर संक्रांति का शाश्वत, आध्यात्मिक और तत्वमय संदेश है।
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