मां दुर्गा की उपासना के लिए समर्पित मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत जून 2026 में विशेष शुभ संयोग में मनाया जाएगा। इस बार ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष अष्टमी पर रवि योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा और व्रत करने से सुख-समृद्धि, धन लाभ और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
कब है मासिक दुर्गाष्टमी 2026?
पंचांग के अनुसार, मासिक दुर्गाष्टमी 22 जून 2026, सोमवार को मनाई जाएगी।
| तिथि | समय |
|---|---|
| अष्टमी तिथि प्रारंभ | 21 जून 2026, दोपहर 3:20 बजे |
| अष्टमी तिथि समाप्त | 22 जून 2026, दोपहर 3:39 बजे |
मासिक दुर्गाष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त
| शुभ योग और मुहूर्त | समय |
|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 4:04 बजे से 4:44 बजे तक |
| अभिजीत मुहूर्त | सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक |
| विजय मुहूर्त | दोपहर 2:43 बजे से 3:39 बजे तक |
| गोधूलि मुहूर्त | शाम 7:21 बजे से 7:41 बजे तक |
| रवि योग | सुबह 10:22 बजे से दोपहर 12:32 बजे तक |
क्यों खास है यह दुर्गाष्टमी?
इस बार मासिक दुर्गाष्टमी पर रवि योग का शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में रवि योग को बाधाओं को दूर करने वाला और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस योग में मां दुर्गा की पूजा करने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं।
कैसे करें मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा?
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें।
हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
मां दुर्गा के समक्ष देसी घी का दीपक जलाएं।
लाल फूल, फल, मिठाई और नारियल अर्पित करें।
दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा और आरती का पाठ करें।
जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करें।
इन बातों का रखें विशेष ध्यान
मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का सेवन न करें।
किसी से विवाद या अपशब्द का प्रयोग न करें।
काले रंग के वस्त्र पहनने से बचें।
बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से परहेज करें।
सात्विक भोजन ग्रहण करें और मन को शांत रखें।
धार्मिक मान्यता
मान्यता है कि मासिक दुर्गाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहती है, आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पंचांग पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार तिथि एवं मुहूर्त में अंतर संभव है। श्रद्धालु स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य से भी परामर्श कर सकते हैं।