New Delhi | पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करता है। पंचांग के अनुसार, 30 सितंबर 2026, बुधवार को पितृपक्ष का चतुर्थी श्राद्ध किया जाएगा। इस बार खास बात यह है कि चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। तिथियों के समय में अंतर के कारण दोनों तिथियां 30 सितंबर को पड़ रही हैं। ऐसे में चतुर्थी और पंचमी तिथि में निधन हुए पितरों के लिए इसी दिन श्राद्ध कर्म किए जा सकेंगे।
चतुर्थी श्राद्ध किसके लिए किया जाता है?
चतुर्थी श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाने वाला श्राद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि परिवार के किसी सदस्य का निधन शुक्ल या कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ है, तो पितृपक्ष में उनके लिए चतुर्थी श्राद्ध किया जाता है। हिंदू परंपरा में जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए चतुर्थी तिथि को मृत्यु होने पर पितृपक्ष की चतुर्थी तिथि में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। कई स्थानों पर चतुर्थी श्राद्ध को चौथ श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है।
30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
पंचांग के अनुसार इस वर्ष 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों से संबंधित श्राद्ध कर्म किए जाएंगे। तिथियों के समय में अंतर कम होने के कारण दोनों तिथियां एक ही दिन पड़ रही हैं। ऐसे में जिन पितरों का निधन चतुर्थी या पंचमी तिथि को हुआ था, उनके लिए 30 सितंबर के अपराह्न काल में श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
चतुर्थी श्राद्ध 2026 का शुभ मुहूर्त
30 सितंबर 2026, बुधवार को श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त को शुभ माना गया है।
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 बजे से 1:22 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:22 बजे से 3:45 बजे तक
परंपरा के अनुसार श्राद्ध से जुड़े प्रमुख कर्म अपराह्न काल में किए जाते हैं और इन्हें अपराह्न काल समाप्त होने से पहले पूरा करने का महत्व बताया गया है।
चतुर्थी श्राद्ध में क्या किया जाता है?
चतुर्थी श्राद्ध के दिन श्राद्धकर्ता सुबह स्नान आदि करने के बाद पितरों का स्मरण करता है और श्राद्ध कर्म का संकल्प लेता है। इसके बाद परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाता है। तर्पण के दौरान जल और तिल आदि अर्पित कर पितरों का स्मरण किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की भी परंपरा है।
पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान का महत्व
पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हालांकि, श्राद्ध की विधि और मुहूर्त में स्थानीय पंचांग, स्थान और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए महत्वपूर्ण धार्मिक कर्म करने से पहले स्थानीय विद्वान या पुरोहित से समय की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
बुधवार को पड़ रहा है चतुर्थी श्राद्ध
इस बार चतुर्थी श्राद्ध बुधवार को पड़ रहा है। धार्मिक परंपरा में बुधवार का संबंध भगवान गणेश से माना जाता है। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। इसी कारण धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले श्रद्धालु इस दिन भगवान गणेश की पूजा के साथ अपने पितरों का स्मरण और श्राद्ध कर्म भी करेंगे।
ध्यान रखें ये जरूरी बातें
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म करते समय तिथि और मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। जिन लोगों को अपने पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात है, वे उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करते हैं। चतुर्थी या पंचमी तिथि से संबंधित पितरों के लिए इस वर्ष 30 सितंबर को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। श्राद्ध की स्थानीय परंपराओं और पंचांग के अनुसार विधि अलग हो सकती है, इसलिए अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।