हरिद्वार: पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही देशभर में लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं। हिंदू धार्मिक परंपरा में इन दिनों को पितरों के स्मरण और उनके लिए धार्मिक कर्मकांड करने का विशेष समय माना जाता है। इसी वजह से हरिद्वार की नारायणी शिला भी पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ बन जाती है।
गंगा तट पर स्थित है नारायणी शिला
नारायणी शिला उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा तट पर स्थित भगवान विष्णु से जुड़ा प्राचीन धार्मिक स्थल है। यहां पितरों के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर किए गए पितृ कर्म से पूर्वजों को मोक्ष और शांति की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

भगवान विष्णु के हृदय स्थल से जुड़ी है मान्यता
नारायणी शिला को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में भगवान विष्णु के श्रीविग्रह से जुड़ी मान्यता मिलती है। इसके अनुसार भगवान विष्णु के शरीर के अलग-अलग हिस्सों का संबंध तीन प्रमुख पितृ तीर्थों से माना गया है। गया में भगवान विष्णु के चरण, बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में शीर्ष भाग और हरिद्वार की नारायणी शिला में कंठ से नाभि तक का हिस्सा माना जाता है। इसी कारण नारायणी शिला को भगवान विष्णु का हृदय स्थल भी कहा जाता है।
कमलासन और गयासुर की कथा क्या है?
नारायणी शिला की पौराणिक मान्यता का संबंध गयासुर की कथा से भी बताया जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार गयासुर ने भगवान विष्णु से मोक्ष प्राप्त करने की कामना की थी। कथा के एक रूप में भगवान विष्णु और गयासुर के बीच युद्ध का वर्णन मिलता है। इसी दौरान भगवान के कमलासन के तीन हिस्से होने की मान्यता है। इन हिस्सों का संबंध हरिद्वार, बदरीनाथ और गया से जोड़ा जाता है।
तीनों स्थानों का पितृ कर्म से संबंध
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के कमलासन के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े इन तीनों स्थानों का पितृ कर्म में विशेष महत्व है। गया में विष्णुपाद, बदरीनाथ में ब्रह्मकपाल और हरिद्वार में नारायणी शिला पर श्राद्ध एवं तर्पण की परंपरा बताई जाती है। यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान इन तीर्थस्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

नारायणी शिला पर क्यों किया जाता है पिंडदान?
हिंदू धार्मिक मान्यता में पिंडदान को पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने की महत्वपूर्ण विधि माना गया है। नारायणी शिला गंगा तट पर स्थित होने के कारण यहां गंगा स्नान के बाद तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। आस्थावान मानते हैं कि यहां किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
पितृपक्ष में बढ़ जाता है धार्मिक महत्व
पितृपक्ष के दौरान नारायणी शिला पर देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इसे पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर माना जाता है।
पितृपक्ष 2026 कब से कब तक?
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से हुई है। यह अवधि 10 अक्टूबर 2026, यानी सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगी। इन दिनों में लोग अपनी पारिवारिक परंपरा और पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं।