न ट्रैक की बड़ी सुविधा, न आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर... पहाड़ों की पगडंडियों पर दौड़ते हुए तैयार हुए सावन बरवाल ने अब एशियन गेम्स में इतिहास रच दिया है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के रडाभांकर गांव से आने वाले सावन ने 26 सितंबर 2026 को नागोया में पुरुष मैराथन में रजत पदक जीता। उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का समय निकालकर अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया।यह सावन की सिर्फ दूसरी प्रतिस्पर्धी मैराथन थी। उनका रजत भारत का 1982 के बाद एशियन गेम्स पुरुष मैराथन में पहला पदक है।
मंडी के गांव से शुरू हुआ सफर
सावन बरवाल का जन्म 18 फरवरी 1998 को हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदरनगर क्षेत्र के रडाभांकर गांव में हुआ। उनका परिवार साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से था। उनके पिता कार चालक थे।शुरुआती दौर में सावन के पास आधुनिक एथलेटिक्स ट्रैक या बड़े प्रशिक्षण केंद्र जैसी सुविधाएं नहीं थीं। पहाड़ी रास्तों की चढ़ाई और ढलान ही उनकी दौड़ का हिस्सा बने। इन्हीं कठिन रास्तों पर लगातार दौड़ने से उनकी सहनशक्ति मजबूत हुई।स्कूल के दिनों में उन्होंने दौड़ के अलावा वॉलीबॉल, कबड्डी और खो-खो में भी हिस्सा लिया।
सेना में भर्ती होने के सपने ने दौड़ से जोड़ा
सावन ने शुरुआत में भारतीय सेना में भर्ती होने के लक्ष्य के साथ दौड़ना शुरू किया था। 2017 की सेना भर्ती के दौरान उनकी क्षमता पर अधिकारियों की नजर पड़ी और उन्हें पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण का अवसर मिला।इसके बाद उनकी प्रतिभा को व्यवस्थित प्रशिक्षण मिला। 2019 में वह भारतीय सेना की इंजीनियरिंग कोर में हवलदार के रूप में शामिल हुए।
1500, 5000 और 10 हजार मीटर से मैराथन तक
सावन का शुरुआती करियर ट्रैक स्पर्धाओं पर केंद्रित रहा। उन्होंने 1500 मीटर, 5000 मीटर और 10,000 मीटर में प्रतिस्पर्धा की। राष्ट्रीय स्तर पर 5000 और 10,000 मीटर में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई।बाद में उनकी सहनशक्ति को देखते हुए उन्हें लंबी दूरी की सड़क दौड़ की ओर बढ़ने की सलाह मिली। इसके बाद उन्होंने 42.195 किलोमीटर की मैराथन को अपना लक्ष्य बनाया और कूनूर स्थित रिलायंस फाउंडेशन एथलेटिक्स सेंटर में कोच अजीत मार्कोस के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लिया।
अप्रैल में 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा
सावन ने 12 अप्रैल 2026 को नीदरलैंड्स की NN रॉटरडैम मैराथन में अपना प्रतिस्पर्धी मैराथन डेब्यू किया। कठिन मौसम और आखिरी हिस्से की परेशानी के बावजूद उन्होंने 2:11:58 का समय निकाला और 20वें स्थान पर रहे।इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने शिवनाथ सिंह का 1978 में बनाया 2:12:00 का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया। यह रिकॉर्ड करीब 48 वर्षों तक कायम रहा था।
दूसरी ही मैराथन में एशियन गेम्स का रजत
रॉटरडैम के कुछ महीनों बाद सावन अपनी दूसरी प्रतिस्पर्धी मैराथन के लिए एशियन गेम्स में उतरे। नागोया में हुई रेस में उन्होंने शुरुआत से ही अग्रणी धावकों के समूह के साथ अपनी स्थिति बनाए रखी।रेस के अंतिम हिस्से में जापान के इचिटाका यामाशिता ने बढ़त बनाई और स्वर्ण पदक जीता। सावन ने चीन के पेइयू फेंग को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया।सावन ने 2:11:37 का समय निकालकर अपना राष्ट्रीय रिकॉर्ड फिर बेहतर किया। यामाशिता ने 2:10:49 के समय के साथ स्वर्ण जीता।
44 साल बाद भारत को मिला मैराथन पदक
सावन के रजत के साथ भारत का एशियन गेम्स पुरुष मैराथन में पदक का इंतजार खत्म हुआ। भारत ने इससे पहले इस स्पर्धा में 1982 में पदक जीता था।सावन अब एशियन गेम्स पुरुष मैराथन में पदक जीतने वाले भारत के चौथे धावक हैं।
सावन बरवाल की उपलब्धियों पर एक नजर
उपलब्धि जानकारी
जन्म 18 फरवरी 1998
गांव रडाभांकर, जोगिंदरनगर, मंडी
सेना भारतीय सेना, इंजीनियरिंग कोर
मैराथन डेब्यू रॉटरडैम मैराथन, अप्रैल 2026
डेब्यू टाइम 2:11:58
पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड 2:12:00, शिवनाथ सिंह
एशियन गेम्स 2026 रजत पदक
एशियन गेम्स समय 2:11:37
मैराथन राष्ट्रीय रिकॉर्ड 2:11:37
पहाड़ों की पगडंडियों से एशियाड के पोडियम तक
सावन बरवाल की कहानी में खास बात यह है कि उनका शुरुआती प्रशिक्षण किसी बड़े आधुनिक ट्रैक से नहीं, बल्कि हिमाचल के पहाड़ी रास्तों से जुड़ा रहा। सेना में भर्ती होने के सपने के साथ शुरू हुई दौड़ ने उन्हें ट्रैक एथलीट बनाया, फिर मैराथन तक पहुंचाया।अप्रैल में 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने के बाद उन्होंने अपनी दूसरी ही प्रतिस्पर्धी मैराथन में एशियन गेम्स का रजत जीत लिया। इस प्रदर्शन के साथ सावन ने भारतीय मैराथन के रिकॉर्ड और एशियन गेम्स के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।