इसरो ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए जिस स्थान को चुना है, वह साधारण जगह नहीं बल्कि चंद्र सतह का बेहद महत्वपूर्ण इलाका है। साउथ पोल के निकट स्थित मॉन्स माउटन लगभग 6,000 मीटर ऊंचा पहाड़ है, जिसकी चोटी अपेक्षाकृत सपाट है और यही विशेषता इसे लैंडिंग के लिए उपयुक्त बनाती है। लंबे समय तक सूर्य की रोशनी, अपेक्षाकृत सुरक्षित भूभाग और संभावित वॉटर आइस की मौजूदगी इसे वैज्ञानिकों के लिए और भी आकर्षक बनाती है।
चंद्रयान-2 की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों से शोध को मिली दिशा
लैंडिंग साइट की खोज में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर एक बार फिर इसरो के लिए ‘आई इन द स्काई’ साबित हुआ। ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा (OHRC) द्वारा ली गई 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल की सूक्ष्म तस्वीरों ने वैज्ञानिकों को छोटे क्रेटर, ढलान, बोल्डर और सतही संरचना को बेहद विस्तार से समझने में मदद की। यही विश्लेषण लैंडिंग साइट के चयन में निर्णायक साबित हुआ।
MM-4 साइट क्यों है सबसे सुरक्षित विकल्प
मॉन्स माउटन की चार संभावित लैंडिंग साइटों में MM-4 को सर्वश्रेष्ठ पाया गया। इस क्षेत्र में औसत ढलान लगभग 5 डिग्री है, जबकि लैंडर 10 डिग्री तक के ढलान पर सुरक्षित उतर सकता है। यहां बड़े बोल्डर बेहद कम हैं और अधिकांश पत्थर 0.3 मीटर से भी छोटे पाए गए हैं। 11–12 दिन तक लगातार सूर्य की रोशनी और पृथ्वी से निर्बाध रेडियो संपर्क इसे और भी आदर्श बनाते हैं।
लैंडिंग ही नहीं, सैंपल भी लेकर लौटेगा चंद्रयान-4
2104 करोड़ रुपये लागत वाला चंद्रयान-4 केवल चंद्रमा पर उतरकर वैज्ञानिक अध्ययन ही नहीं करेगा, बल्कि पहली बार चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों के नमूने पृथ्वी पर लेकर आएगा। यह मिशन इसरो के सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण अभियानों में से एक है। दो अलग-अलग रॉकेट—LVM-3 और PSLV—अपने अपने मॉड्यूल लेकर प्रक्षेपित होंगे। एक स्टैक उत्खनन और संग्रहण का कार्य करेगा, जबकि दूसरा सैंपल को पृथ्वी तक सुरक्षित वापसी के लिए आवश्यक मॉड्यूल लेकर जाएगा।
भारत के अंतरिक्ष विज्ञान का ऐतिहासिक कदम
चंद्रयान-4 सिर्फ एक मिशन नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष विज्ञान की नई उड़ान का प्रतीक है। चंद्र सतह से सैंपल लाकर अध्ययन करना वैज्ञानिक खोजों के बिल्कुल नए क्षितिज खोलेगा। यह मिशन न केवल इसरो की तकनीकी क्षमता का प्रमाण होगा, बल्कि मानवता के चंद्र अध्ययन के इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ेगा।
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