ब्रह्मांड कितना विशाल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंसान आज भी उसके एक बेहद छोटे हिस्से को ही समझ पाया है। अरबों प्रकाशवर्ष दूर मौजूद आकाशगंगाओं, तारों, ग्रहों और ब्लैक होल की दुनिया को समझने के लिए वैज्ञानिक लगातार ऐसे उपकरण विकसित कर रहे हैं, जो पहले से कहीं अधिक रोशनी और सूक्ष्म संकेतों को पकड़ सकें। इसी कोशिश का सबसे महत्वाकांक्षी उदाहरण चिली के अटाकामा रेगिस्तान में आकार ले रहा एक्सट्रीमली लार्ज टेलीस्कोप यानी ईएलटी है। यूरोपीय सदर्न ऑब्जर्वेटरी का यह विशाल भू-आधारित दूरबीन पूरा होने के बाद दृश्य और निकट-अवरक्त प्रकाश के लिए दुनिया का सबसे बड़ा ऑप्टिकल टेलीस्कोप बनने जा रहा है। इसके 39 मीटर के मुख्य दर्पण का प्रकाश संग्रहण क्षेत्र करीब 978 वर्ग मीटर होगा, जिससे बेहद दूर स्थित खगोलीय पिंडों का अध्ययन कहीं अधिक विस्तार से किया जा सकेगा।
260 फीट ऊंचा गुंबद और 39 मीटर का विशाल दर्पण
ईएलटी की विशालता का अंदाजा उसके निर्माण की संरचना से ही लगाया जा सकता है। इसका गुंबद दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप गुंबदों में होगा और इसकी ऊंचाई करीब 80 मीटर यानी लगभग 260 फीट रखी जा रही है। टेलीस्कोप का मुख्य दर्पण 39 मीटर व्यास का होगा, लेकिन इतनी बड़ी सतह को एक ही टुकड़े में बनाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। इसलिए इसे 798 षट्कोणीय खंडों को बेहद सटीक तरीके से जोड़कर तैयार किया जा रहा है। प्रत्येक खंड करीब 1.5 मीटर चौड़ा है और दर्पण की पूरी सतह को एक साथ काम करने के लिए इन खंडों की स्थिति को नैनोमीटर स्तर की सटीकता से नियंत्रित किया जाएगा। ईएसओ के अनुसार इन खंडों को मिलाकर तैयार होने वाला दर्पण अब तक किसी ऑप्टिकल टेलीस्कोप के लिए बनाया गया सबसे बड़ा मुख्य दर्पण होगा।
अटाकामा रेगिस्तान को ही क्यों चुना गया?
इतनी विशाल दूरबीन को किसी शहर या सामान्य इलाके में बनाने के बजाय चिली के बेहद शुष्क अटाकामा रेगिस्तान में स्थित सेरो अरमाजोनेस को चुना गया है। खगोल विज्ञान के लिए किसी स्थान की सबसे बड़ी जरूरत साफ और स्थिर आसमान होती है, क्योंकि वातावरण में मौजूद नमी, बादल और वायुमंडलीय हलचल दूर के तारों और आकाशगंगाओं से आने वाली रोशनी को प्रभावित कर सकती है। अटाकामा दुनिया के सबसे शुष्क क्षेत्रों में शामिल है और यहां आसमान की परिस्थितियां खगोलीय अवलोकनों के लिए असाधारण रूप से अनुकूल मानी जाती हैं। ईएलटी समुद्र तल से करीब 3046 मीटर की ऊंचाई पर बनाया जा रहा है। इस ऊंचाई और शुष्क वातावरण का फायदा उठाकर वैज्ञानिक ब्रह्मांड से आने वाले बेहद कमजोर प्रकाश संकेतों को अधिक स्पष्टता के साथ दर्ज कर सकेंगे।
सिर्फ दूर के तारे नहीं, ग्रहों और ब्लैक होल तक की होगी पड़ताल
ईएलटी की सबसे बड़ी खासियत केवल उसका आकार नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली वैज्ञानिक क्षमता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह दूर स्थित आकाशगंगाओं के निर्माण और विकास को समझने, दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों का अध्ययन करने और संभावित रूप से रहने योग्य एक्सोप्लैनेट की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके जरिए सुपरमैसिव ब्लैक होल, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी जैसे ब्रह्मांड के सबसे जटिल सवालों पर भी नई जानकारी जुटाई जा सकेगी। ईएसओ के अनुसार ईएलटी की अत्याधुनिक तकनीक खगोलीय पिंडों से आने वाली रोशनी का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करने में सक्षम होगी। इसका मतलब यह है कि वैज्ञानिक सिर्फ यह नहीं देख पाएंगे कि कोई वस्तु कहां मौजूद है, बल्कि उसके वातावरण, संरचना और विकास से जुड़े संकेतों को भी अधिक गहराई से समझने की कोशिश कर सकेंगे।
798 दर्पण खंडों को एक साथ चलाना भी बड़ी चुनौती
इतने बड़े दर्पण को बनाना जितना कठिन है, उसे लगातार सही स्थिति में बनाए रखना उससे कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। ईएलटी के 798 मुख्य दर्पण खंडों को एक ही विशाल दर्पण की तरह काम करना होगा। इसके लिए हजारों सेंसर और अत्यंत सटीक नियंत्रण प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि हवा, तापमान और टेलीस्कोप की हलचल से होने वाले सूक्ष्म बदलावों को लगातार ठीक किया जा सके। ईएसओ के अनुसार दर्पण के खंडों की स्थिति को दसियों नैनोमीटर की सटीकता के भीतर बनाए रखना होगा, जो मानव बाल की मोटाई से लगभग 10000 गुना अधिक सूक्ष्म स्तर है। इसके अलावा वायुमंडलीय हलचल से पैदा होने वाली छवि की विकृति को कम करने के लिए अनुकूली प्रकाशिकी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यही तकनीक ईएलटी को दूरस्थ ब्रह्मांड की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर हासिल करने में मदद करेगी।
निर्माण पूरा होने के बाद कब शुरू होंगे वैज्ञानिक अवलोकन?
ईएलटी परियोजना पर काम कई वर्षों से चल रहा है और इसके निर्माण में कई जटिल तकनीकी चरण शामिल हैं। निर्माण के दौरान मौसम, अत्याधुनिक तकनीकों के विकास और उपकरणों के निर्माण से जुड़ी चुनौतियों के कारण समय-सारिणी में बदलाव भी हुआ है। ईएसओ की मौजूदा योजना के अनुसार टेलीस्कोप का पहला परीक्षण अवलोकन 2029 में होने की उम्मीद है, जबकि वैज्ञानिक उपकरणों के साथ इसका पहला वैज्ञानिक प्रकाश दिसंबर 2030 में मिलने की योजना है। मुख्य दर्पण के 798 खंडों की स्थापना 2028 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका अर्थ है कि अगले कुछ वर्षों में यह विशाल परियोजना धीरे-धीरे उस मुकाम तक पहुंचेगी, जहां इंसान धरती से ब्रह्मांड को देखने की अपनी क्षमता में एक और ऐतिहासिक छलांग लगा सकेगा।
ब्रह्मांड के सबसे बड़े सवालों के जवाब तलाशने की उम्मीद
ईएलटी को केवल एक विशाल दूरबीन के रूप में देखना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह ऐसी वैज्ञानिक मशीन है, जिसका उद्देश्य उन सवालों तक पहुंचना है जिनके जवाब आधुनिक खगोल विज्ञान के सामने अब भी अधूरे हैं। दूसरे तारों के ग्रहों से लेकर शुरुआती आकाशगंगाओं तक और ब्लैक होल से लेकर डार्क मैटर व डार्क एनर्जी तक, इसकी नजर ब्रह्मांड के उन हिस्सों पर होगी जहां से आज बेहद सीमित जानकारी मिल पाती है। 39 मीटर के मुख्य दर्पण और करीब 978 वर्ग मीटर के प्रकाश संग्रहण क्षेत्र के कारण यह दूरबीन बेहद कमजोर और दूरस्थ प्रकाश संकेतों को पकड़ने की असाधारण क्षमता हासिल करेगी। यदि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसका वैज्ञानिक संचालन 2030 में शुरू होता है, तो आने वाला दशक खगोल विज्ञान में ऐसी खोजों का गवाह बन सकता है, जो ब्रह्मांड और उसमें पृथ्वी के स्थान को समझने की हमारी मौजूदा तस्वीर को ही बदल दें।