उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में गोवंश की संख्या में पांच वर्षों के दौरान आई बड़ी गिरावट ने गो-संरक्षण व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2019 से 2024 के बीच प्रदेश में गोवंश की संख्या में 37.18 प्रतिशत की कमी दर्ज होने का दावा किया गया है। वहीं, महिषवंश की संख्या में भी 25.94 प्रतिशत की गिरावट बताई गई है। इन आंकड़ों को लेकर आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
पांच साल में गोवंश की संख्या में बड़ी गिरावट
उत्तर प्रदेश में 20वीं और 21वीं पशुगणना के आंकड़ों की तुलना में गोवंश की संख्या में 37.18 प्रतिशत की कमी सामने आने की बात कही गई है। यह तुलना वर्ष 2019 और 2024 में हुई पशुगणना के आंकड़ों के आधार पर की गई है। उत्तर प्रदेश पशुधन विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की ओर से 7 अगस्त 2026 को जारी पत्र में इन आंकड़ों का उल्लेख होने की बात कही गई है। इसके अलावा महिषवंश की संख्या में भी 25.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज होने का दावा किया गया है। इतनी बड़ी कमी ने पशुधन संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मामले को लेकर अब आंकड़ों के वास्तविक कारणों की जांच की मांग उठ रही है।
कृत्रिम गर्भाधान के लक्ष्य में भी कमी
गोवंश की संख्या में आई गिरावट का असर सरकार की पशुधन संबंधी योजनाओं पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। सामने आए आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2026-27 के लिए कृत्रिम गर्भाधान के लक्ष्य को कम करने की बात कही गई है। कृत्रिम गर्भाधान पशुधन की संख्या और नस्ल सुधार से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसे में इसके लक्ष्य में कमी को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अमिताभ ठाकुर ने इस स्थिति के पीछे के कारणों की विस्तृत पड़ताल की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि केवल आंकड़ों में गिरावट दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। यह पता लगाना जरूरी है कि आखिर पशुधन की संख्या में इतनी बड़ी कमी क्यों आई।
सरकारी योजनाओं के बावजूद क्यों घटी संख्या?
पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने गोवंश की संख्या में कमी को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में गोवंश संरक्षण और संवर्धन को सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। गोआश्रय व्यवस्था समेत कई योजनाओं के जरिए इस दिशा में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद यदि पांच वर्षों में गोवंश की संख्या में 37.18 प्रतिशत की कमी हुई है, तो इसके कारणों की जांच जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकारी योजनाओं का जमीन पर कितना प्रभाव पड़ा। साथ ही योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति की भी समीक्षा किए जाने की जरूरत बताई गई है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से इस पूरे मामले की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच के जरिए गोवंश की संख्या में कमी के वास्तविक कारण सामने आने चाहिए। यदि कहीं प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो उसकी भी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। इसके अलावा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी तरह की अनियमितता हुई है या नहीं, इसकी भी पड़ताल की मांग की गई है। उनका कहना है कि इतने बड़े आंकड़े को केवल सामान्य गिरावट मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। निष्पक्ष जांच के जरिए तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना जरूरी है।
सरकारी खर्च और गो-संरक्षण नीति पर भी सवाल
गोवंश की संख्या में कमी का मुद्दा केवल पशुगणना के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इससे गो-संरक्षण के लिए बनाई गई सरकारी नीतियों और उन पर खर्च किए गए सार्वजनिक धन के प्रभाव पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि संरक्षण योजनाओं पर लगातार संसाधन खर्च किए गए हैं, तो उनके परिणामों का आकलन भी जरूरी है। गोआश्रय स्थलों की व्यवस्था, पशुओं की देखभाल और संरक्षण योजनाओं की प्रभावशीलता की समीक्षा की जा सकती है। अमिताभ ठाकुर ने इसी व्यापक पहलू को ध्यान में रखते हुए जांच की मांग की है। अब सवाल यह है कि सरकार इन आंकड़ों और उठाए गए सवालों पर क्या जवाब देती है। विस्तृत जांच के बाद ही स्थिति की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।