पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां करीब ढाई दशक तक मजबूत पकड़ बनाए रखने वाली तृणमूल कांग्रेस 2026 के विधानसभा चुनाव में भारी गिरावट का सामना करती दिख रही है। कभी राज्य की सबसे प्रभावशाली ताकत रही पार्टी अब सीमित सीटों तक सिमटती नजर आ रही है, जबकि भाजपा ने जबरदस्त उभार दिखाया है।
शुरुआत से शिखर तक का सफर
1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी। शुरुआती चुनावों में सीमित सफलता के बाद पार्टी ने तेजी से विस्तार किया। 2011 में वाम शासन को समाप्त कर सत्ता में आई और 2016 में 200 से अधिक सीटों के साथ अपने चरम पर पहुंच गई। 2014 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की।
आंदोलनों से बनी जननेता की छवि
सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि आंदोलनों ने पार्टी के लिए टर्निंग प्वाइंट का काम किया। इन घटनाओं ने ममता बनर्जी को किसानों और आम लोगों की नेता के रूप में स्थापित किया, जिसका फायदा चुनावी नतीजों में साफ नजर आया।
2019 से बदलने लगा समीकरण
2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल की सीटें कम हुईं और भाजपा ने जोरदार एंट्री की। पार्टी का वोट शेयर तेजी से बढ़ा और पहली बार राज्य में सीधी टक्कर का माहौल बना।
2021 में चेतावनी, 2026 में झटका
2021 में तृणमूल सत्ता बचाने में सफल रही, लेकिन भाजपा मजबूत विपक्ष बनकर उभरी। इसके बाद 2026 में स्थिति पूरी तरह बदल गई, जहां तृणमूल की सीटें तेजी से घटीं और भाजपा निर्णायक बढ़त की ओर बढ़ गई।
वोट शेयर का खेल समझिए
आंकड़े बताते हैं कि तृणमूल का वोट प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं गिरा, लेकिन भाजपा का वोट तेजी से बढ़ा। यही छोटा अंतर सीटों के बड़े अंतर में बदल गया और राजनीतिक संतुलन बदल गया।
क्षेत्रीय पकड़ में आई दरार
उत्तर बंगाल में भाजपा की मजबूत पकड़ और दक्षिण बंगाल में संगठन की कमजोरी ने तृणमूल को नुकसान पहुंचाया। शहरी मतदाताओं और युवाओं का झुकाव भी बदलता नजर आया।
सत्ता विरोधी लहर और संगठन संकट
लगातार सत्ता में रहने से एंटी-इनकंबेंसी बढ़ी। साथ ही, बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन कमजोर हुआ और भाजपा को इसका फायदा मिला।
विवादों ने भी किया असर
चिटफंड, भर्ती घोटाले और अन्य विवादों ने आम जनता के भरोसे को प्रभावित किया। हालांकि सरकारी योजनाओं से कुछ राहत मिली, लेकिन नाराजगी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।