नई दिल्ली/कोलकाता: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी नागरिक का मत देने का अधिकार स्थायी रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें इसका स्पष्ट कारण बताना अनिवार्य होगा।
न्यायाधिकरण की व्यवस्था और जांच प्रक्रिया
अदालत के निर्देशानुसार, जोका स्थित जल एवं स्वच्छता संस्थान में न्यायाधिकरण बैठेगा और न्यूटाउन समेत छह स्थानों पर मामलों की सुनवाई की जाएगी। ‘विचाराधीन’ मतदाताओं के दस्तावेजों की दोबारा जांच होगी और नए प्रमाणों के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
न्यायाधिकरण शुरू होने में देरी
हालांकि तय समय पर न्यायाधिकरण काम शुरू नहीं कर पाया। बुधवार शाम की महत्वपूर्ण बैठक रद्द होने से पूरी प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
चुनाव से पहले बढ़ी मतदाताओं की चिंता
राज्य में चुनाव नजदीक हैं। 6 अप्रैल पहले चरण के नामांकन की अंतिम तिथि है, जबकि 9 अप्रैल दूसरे चरण की। नियम के अनुसार, अंतिम तिथि तक मतदाता सूची में नाम होना जरूरी है। ऐसे में ‘हटाए गए’ और ‘विचाराधीन’ मतदाताओं की चिंता बढ़ती जा रही है।
लाखों मतदाता अब भी ‘विचाराधीन’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बताया कि करीब 60 लाख मतदाता अभी भी ‘विचाराधीन’ हैं, जिनमें से लगभग 47 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 7 अप्रैल तक सभी मामलों के निपटारे का भरोसा दिया है।
याचिकाकर्ताओं और वकीलों की दलील
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश वकील श्याम दीवान ने दावा किया कि 55 प्रतिशत नाम जोड़े गए हैं, जबकि 45 प्रतिशत हटाए गए हैं। वहीं वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने उम्मीद जताई कि अदालत इस मुद्दे पर स्पष्ट समाधान देगी।
अगली सुनवाई की तिथि तय
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने दोहराया कि मत देने का अधिकार छीना नहीं जा सकता। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को शाम 4 बजे होगी।